राजनीति लेख

दिल्ली दंगा: गुलेल कहते हैं गुनाह की कहानी

On Sun, 1 Mar 2020, 07:12 Amit Ambashtha, wrote:
दिल्ली दंगा : गुलेल कहते हैं गुनाह की कहानी
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नागरिकता संशोधन कानून पर जिस तरह से विपक्ष देश के कुछ प्रतिशत मुसलमानों को भ्रमित करने में सफल रहा , देखते देखते माहौल खराब होने लगा , जे एन यू से जामिया तक विपक्ष की भड़काई इस चिंगारी ने आग का रूप ले लिया, दिल्ली विधानसभा चुनाव मद्देनज़र , महिलाओं और बच्चों के सहारे शाहीन बाग का विरोध प्रदर्शन अस्तित्व में आया , जहां महिलाएं और बच्चे प्रशासन के बिना किसी अनुमति के बीच सड़क पर बैठ गयी , सड़क अवरूद्ध कर दिया गया , जिसकी फंडिंग आज भी प्रश्नों के घेरे में है ।
दिल्ली चुनाव के मद्देनजर जहाँ भाजपा शाहीन बाग को हिंदू मतों को गोलबंद करने का हथियार समझकर इस्तेमाल करती रही , वहीं आम आदमी पार्टी के मुखिया बखूबी जानते थे कि चुनाव में इस विरोध प्रदर्शन के कारण मुसलमान लामबन्द होंगे , जिसका लाभ सीधा आम आदमी पार्टी को मिलेगा और ऐसा हुआ भी , लेकिन जहाँ भाजपा यह कहती रही कि शाहीन बाग आम आदमी पार्टी की साजिश है वही आप पार्टी के कुछ नेता शाहीन बाग का समर्थन करते नजर आए तो कुछ भाजपा की साजिश करार देते रहे ।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या महीनों तक कोई विरोध प्रदर्शन सार्वजनिक सड़क को अवरूद्ध कर चलाया जा सकता है ? क्या कहता है कानून? अगर नहीं चलाया जा सकता तो केन्द्र सरकार जिसके पास दिल्ली में पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी है , क्यों हाथ पर हाथ धरे बैठी रही ? बतौर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की क्या जिम्मेदारी थी ? शाहीन बाग पर याचिका पर सुनवाई करते हुए क्या उच्चतम न्यायालय का आदेश सही था ? शाहीन बाग के प्रदर्शन के बाद जैसे अलग-अलग मुसलमान बहुल इलाके में शाहीन बाग बनाने की कोशिश और उसके विरोध के बाद जो दंगा भड़का , उसकी जिम्मेदारी किसकी है ? दिल्ली दंगा कहीं राजनीतिक साजिश तो नहीं?
बिना अनुमति किसी सार्वजनिक सड़क को अवरुद्ध कर विरोध प्रदर्शन की अनुमति कानून और संविधान नहीं देता अर्थात यह कानून अपराध है , मोटर वाहन अधिनियम 1988 के सबसेक्सन 201 के मुताबिक अगर, कोई यातायात बाधित करता है तो उसे 50 रू प्रति घटे के अनुसार जुर्माना देना होगा , यहाँ तक की अगर आपका वाहन खराब हो गया है , आपने वाहन को सड़क किनारे लगा दिया है , फिर भी अगर यातायात बाधित होता है तो जुर्माना भरना होगा , इसके अलावा भी कई धाराएं हैं जिसके तहत कारवाई की जानी चाहिये थी, तब जब शाहीन बाग में मीडिया कर्मी के साथ मार पीट की गयी तथा विरोध प्रदर्शन ने सार्वजनिक स्थल पर कब्जा का रूप ले लिया , ऐसी स्थिति में शाहीन बाग के प्रदर्शन को अपराध ही माना जाना चाहिए, जो उच्चतम न्यायालय ने माना भी , क्योंकि यह प्रदर्शन किसी मैदान में भी आयोजित किया जा सकता था । लेकिन अगर यह अपराध है तो केन्द्र सरकार जिसके पास दिल्ली में पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी है , क्यों कोई कठोर कदम नहीं उठा सकी , कहीं न कहीं केन्द्र सरकार भी वोटों के समीकरण को देखते हुए इससे बचती रही , हालांकि भाजपा के ही नेता डाॅ. नन्दकिशोर गर्ग ने याचिका दाखिल कर शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों पर कारवाही हेतु उच्चतम न्यायालय से अनुरोध किया लेकिन फिर भी केन्द्र सरकार सिर्फ इतने से अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकती हैं , अरविंद केजरीवाल जो दिल्ली के चहेते मुख्यमंत्री है केन्द्र सरकार से उनकी टकराहट , धरना , प्रदर्शन तथा एल जी के दरवाजे तक दौड़ और उनको चिट्ठी लिखने में वे माहिर हैं , लेकिन , शाहीन बाग के प्रदर्शन के खिलाफ उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया ,उनके कुछ नेता शाहीन बाग विरोध प्रदर्शन का समर्थन करते रहे और केजरीवाल केन्द्र सरकार को कोसकर अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते रहे ।
शाहीन बाग के विरोध प्रदर्शन की याचिका पर सुनवाई करते उच्चतम न्यायालय का भी निर्णय बेहद रक्षात्मक था , उच्चतम न्यायालय ने यह माना की सड़क जाम कर विरोध प्रदर्शन इतने दिनों तक उचित नहीं है फिर भी उच्चतम न्यायालय ने कानून के अनुसार आदेश या सजा न देकर वार्ताकार भेजने का निर्णय लिया , जो बेहद रक्षात्मक कदम था , यह जगजाहिर था कि यह वार्ता कभी सफल नहीं होगी और हुआ भी ठीक वैसा ही , उच्चतम न्यायालय ने अब तक शाहीन बाग के विरोध प्रदर्शन को कानून के चश्मे से देखकर सजा या जुर्माना नहीं लगाया , जबकि न्यायालय को कानून के अनुसार निर्णय लेना चाहिए, जाति और धर्म न्याय प्रक्रिया में बाधक नहीं हो सकते , लेकिन ऐसा हुआ, जो अपराधियों के मनोबल को ऊंचा करने वाला था , जिसके फलस्वरूप जाफराबाद तथा कुछ अन्य मुसलमान बहुल इलाकों में शाहीन बाग के तर्ज पर ही यातायात बाधित करने की कोशिश की गयी जिसके विरोध में नागिकता संशोधन कानून के समर्थकों का सब्र का बांध टूट गया और उन्होंने भी न सिर्फ इसका विरोध किया अपित शाहीन बाग के तर्ज पर नागरिक संशोधन कानून के समर्थन में बीच सड़क पर बैठने की कोशिश करने लगे , एआईएमआईएम नेता वारिश पठान जैसे नेताओं के भड़काऊ भाषण ने आग में घी काम किया और शहर दंगे की आग के चमेट में आ गया ।
लेकिन जिस तरह से इस दंगे में शाहरूख नाम का एक इंसान सरेआम मौजपूर क्षेत्र में गोलिया चलाता रहा और हेड कांस्टेबल रत्न लाल , इसके शिकार हो गये , समझ आ गया था कि यह संकेट और गहराने वाला है लेकिन न केन्द्र सरकार, न राज्य सरकार और न न्यायालय इस खतरे को भाप सका , न ही किसी ने त्वरित कार्रवाई की कोशिश की गयी , अगले दिन यह आग और भड़की और आइ बी कांस्टेबल अंकित शर्मा सहित तकरीबन 42 इंसानों को नील गयी । सैकड़ों लोग घायल हो गये , सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया , तब जाकर दंगाइयो के देखते ही गोली मारने का आदेश आया , कुछ स्थानों पर कर्फ्यू लगाया गया , लेकिन जिस तरह से आप पार्टी के नेता ताहिर हुसैन का नाम सामने आ रहा है , उसके घर से पेट्रोल बम , हथियार और पत्थर मिले हैं, उसके घर का वीडियो ,जो सोशल मीडिया में वायरल हो चुका है , जिसमें कुछ लोगों की मंशा का अनुमान स्पष्ट रूप से लगाया जा सकता है , इसके अलावा दिल्ली का जो क्षेत्र दंगा से प्रभावित हुआ , वहां छतों पर , रिक्शा में लोहे का एंगल बनाकर उसे गुलेल का रूप दिया गया तथा इससे पेट्रोल बम और पत्थर फेंके गए, इतनी तैयारी आनन – फानन में नहीं हो सकती है , इससे यह स्पष्ट है कि यह दंगा पूर्व नियोजित था और एक तबका पूरी तरह से दंगा के लिए तैयार था , तभी मरने वालों में अधिक्ततर नाम हिंदूओं का है और दुकान भी अधिक्तर हिंदूओं के ही जलाए गए हैं , हलांकि यह जांच का विषय है लेकिन प्रथम दृष्टया बहुत स्पष्ट प्रतीत होता है , कि केन्द्र सरकार और मोदी विरोध हेतु विपक्ष की छटपटाहट का परिणाम शाहीन बाग है जिसका अगला पराव दिल्ली का दंगा था ।
अमित कुमार अम्बष्ट ” आमिली “