कविता

धुआँ

धुआँ का जो है कारोबार तेरा
तेरा कोई मज़हब हो नहीं सकता
तुम चाहे मंदिरों में बैठो या
मस्जिदों में सजदा कर लो
जहाँ तुम जैसे नाखुदा हो मौजूद
वह ख़ुदा का घर हो नहीं सकता
अमित कुमार अम्बष्ट ” आमिली ”