धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

मौन- चिंतन-मनन की स्थिति 

धरती से ज़रा सा ऊपर उठकर देखा तो बड़े हिस्से पर बादलों के कारण कहीं-कहीं  गहरा कालापन और कहीं तेज रौशनी नज़र आई  क्योंकि सूर्य की धूप और धरती के बीच गहरे बादल छाया के लिए ज़िम्मेदार हुए।
थोड़ी ही देर में विमान रूपी मेरा तन-मन  ऊँचाई पा गया और बादलों के निकट पहुँच गयी मैं। तब देखा कि बादलों की भी एक अनिश्चित मोटाई है साथ ही कोई बादल रूई से सफ़ेद और चौड़े, मोटे हैं  और कोई काले धुएँ की तरह ।
मौन  का अर्थ चुप हो जाना नहीं अपितु चिंतन-मनन की स्थिति है  जब इंसान अपने शरीर में रहते हुए भी उससे विलग हो जाता है और उसकी सोच  विस्तृत आकाश पा जाती है।
शीघ्र ही  बादलों के बीच से गुज़रती हुई उनसे ऊपर पहुँच जाती  हूँ। अब मैं बादलों से ऊपर थी  लेकिन अब आकाश एक दम साफ़ और नीला था । जहाँ तक नज़र गयी साफ नीला आकाश, कोई प्रदूषण नहीं, कोई अँधेरा नहीं।बादल मेरे पाँव के नीचे थे। यही सच्चाई है जीवन के पथ पर आने वाली छोटी-बड़ी अड़चनों, परेशानियों और संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर यदि देखा जाए तो आगे का रास्ता साफ़ और मंज़िल नज़दीक नज़र आ सकती है।
नीचे देखने पर भी धरती नहीं दिख रही थी।
 ये तो केवल कुछ हज़ार मीटर की ऊँचाई पर ही थी मैं।
सोचने लगी कि वो जिसे धरती के प्राणी विशेषकर इंसान पल-पल याद करता है , कभी धन्यवाद करता है और कभी अपनी परेशानियों के लिए ज़िम्मेदार मान कर कोसता है वो  तो निस्सीम ऊँचाई पर यानी हर मानवीय दोष से दूर रहता है जैसा कि हमारा मानना है ।
बादलों की पतली परत के पार जाकर भी जब धरती की ओर देखा  तो केवल ज़मीन, कुछ हरियाली -सी और पानी के  टुकड़े ही नज़र आये। इंसान या मानुष की ज़ात का तो कोई निशान नहीं दिखाई दिया जबकि जब हम ज़मीन पर अपने घर-बाहर होते हैं तो बस इंसानों के बारे में ही सोच-सोच ख़ुश या दुःखी होते रहते हैं।
इसलिए ही यह कहा जाता है तनिक अपने से ऊपर उठकर देखिए तो कोई अंतर नहीं रह जाएगा  इंसान -इंसान या अन्य प्राणियों में।
  केवल स्व से ऊपर उठने की आवश्यकता है और जहाँ तक प्रश्न रहा उस अदृश्य शक्ति का तो यही समझना आवश्यक है कि उसके लिए हमारा अस्तित्व या तो नगण्य है या फिर सब एक से हैं । यही निर्वाण की स्थिति रही होगी महापुरुषों की जब वे स्वयं से विरक्ति पाकर सामान्य से अलग हुए होंगे और  मानव होने की भावना और उससे जुड़ी हर छोटी बड़ी बात , सोच और व्यवहार का त्याग कर कुछ ईश्वर के नज़दीक हुए होंगे। सुख-दुःख का एहसास नगण्य हो गया होगा। हर प्राणी एक सा प्रिय लगने लगा होगा।
— पूनम माटिया