कविता

आईना

आज एक बार फिर आईने के सामने खड़ा हूँ मैं,
वो सच्चा है तो हो,अपनी सच्चाई पर अड़ा हूँ मैं,

ना जाने कौन से घमंड का आईने पर साया है।
अपनी सच्चाई पर कुछ इस कदर यकीं है मुझको,
इसलिए उसके सामने कभी ना सर झुकाया है।।

गलतफहमियों का शिकार कोई भी हो सकता है।
आईना खुदा थोड़ी है,फिर क्यों सबने सर झुकाया है।।

जिसने अपने अंतर्मन को हर पाप से मुक्त कर लिया है।
नही जरूरत है फिर उसे किसी भी आईने की गवाही की,
उसने अपने कर्मो को अपना आईना बनाया है।।

कोई कुछ भी कहे,कहने दो,परवाह क्या करना जमाने की,
सही कर्म करते चलो,फिर देखेगा तू,साथ तेरे जमाना है।

परिचय - नीरज त्यागी

पिता का नाम - श्री आनंद कुमार त्यागी माता का नाम - स्व.श्रीमती राज बाला त्यागी ई मेल आईडी- neerajtya@yahoo.in एवं neerajtyagi262@gmail.com ग़ाज़ियाबाद (उ. प्र)

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