लघुकथा

इंसानों का मुल्क

 

” अरे भाईसाहब ! क्या हुआ ? ये अचानक कहाँ जाने की तैयारी है ? ”

” क्या बताऊँ भाईसाहब ! चार साल हो गए इस मुल्क की आबोहवा में साँस लेते हुए । इस मुल्क की माटी से हमें प्यार हो गया है , लेकिन लगता है अब हमें जाना ही होगा यहाँ से । ”

” लेकिन जाओगे कहाँ ? वहीं वापस उसी जगह ,जहाँ से कभी भागकर आये थे ? ”

” क्या कर सकते हैं भाईसाहब ? हम तो इंसानों का मुल्क समझकर आये थे यहाँ , लेकिन अब यह मुल्क भी कुछ खास लोगों का बन कर रह गया है । अब हमें यहाँ से जाना ही होगा । अपने ही वतन में चैन से जी सके तो ठीक , न जी सके तो मरने से तो वह भी न रोक सकेगा । तब हम पूछेंगे उससे कि ये पूरी कायनात बनाई तूने इंसानों के लिए , तो इंसानों के लिए कोई ‘ मुल्क ‘ क्यों नहीं बनाया ? ”

15 /01/2020

परिचय - राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।

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