लघुकथा

नई सोच

                     रामू की नौकरी तो बहुत अच्छी थी लेकिन जो उस को शराब और सिगरट की आदत थी उस ने घर का सारा महौल विगाड़ कर रख दिया था। उस की बीवी और दो बच्चे उसे एक अजनवी की तरह देख कर एक तरफ हो जाते थे। काम से आते वक्त शराब के ठेके की दुकान पर पीना और पनवाड़ी की दुकान से सिगरट लेना ही हर रोज़ उस की मंज़िल होती थी। यह आदत अब बहुत बढ़ चुक्की थी और डाक्टर ने भी उसे चितावनी दे दी थी कि अगर उस ने यह आदतें ना छोड़ीं तो इस की उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। कुछ दिनों से वोह करोना वायरस की बातें सुन रहा था लेकिन उसे इस की कोई परवाह न थी। एक दिन हकूमत ने अचानक लौक डाऊन का हुक्म ऐलान कर दिया। रामू को भी चिंता हो गई और उस को शराब और सिगरटों के बारे में चिंता हो गई। उस ने सोचा कि वोह बहुत सी  बोतलें शराब की और काफी पैकेट सिगरट के खरीद कर रख लेगा लेकिन जब वोह बाजार गया तो सारी दुकानें बंद थीं। उस का माथा ठनका कि अब वोह किया करे। घर में बंद और शराब, सिगरट के बगैर वोह बहुत परेशान हो रहा था। उस को लगने लगा कि उस को कुछ हो जाएगा। करोना से मरने का उस को कोई फ़िक्र नहीं था। उसे लगता था कि शराब और सिगरट के बगैर ही उस की जान चली जायेगी। ऐसे ही कुछ दिन निकल गए। कुछ दिनों के बाद जब वोह सुबह उठा तो उसे तेज़ भूख लगी हुई थी।  उस के कहने से बीवी ने परौठे पका दिए। दही पराठे खाने के बाद उस की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। दिनबदिन अच्छा खाना खाते रहने से उसे महसूस होने लगा कि पिछले कई सालों से शराब और सिगरट की आदत से वोह अपनी और अपने परिवार की ज़िंदगी तबाह कर रहा था। लॉक डाऊन खुलने के बाद जब वोह काम पर जाने लगा तो उस ने  बीवी के सामने कसम खाई कि अब से वोह कभी भी इन चीज़ों को हाथ नहीं लगाएगा। जब वोह पहले दिन काम खत्म करके घर की ओर आ रहा था तो रास्ते में पनवाड़ी और शराब के ठेके के मालकों ने आवाज़ें दीं कि अपनी पसंदीदा सिगरट और शराब की बोतल ले जाए। जब रामू ने  नाह की तो वोह हैरान हुए पूछ रहे थे कि आज क्यों नहीं तो रामू बोला,  ” भाई  ! इस करोना की महामारी ने मुझे सिखा दिया है कि यह ज़िंदगी कितनी कीमती है, इस सुन्दर ज़िंदगी को अपने हाथों से बर्बाद नहीं करना चाहिए।

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.

One thought on “नई सोच

  1. प्रिय गुरमैल भाई जी, कोरोना ने बहुत कुछ सिखा दिया है. अत्यंत सटीक व सार्थक रचना के लिए बधाई व आभार.

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