विज्ञान

हिंदी में विज्ञान को लेकर मासिक पत्रिका ‘विज्ञान प्रगति’ कई सालों से निरंतर उपस्थिति दर्ज़ करा रही हैं !

विज्ञान प्रगति, मार्च 2020 की उपलब्धियां कई हैं, यथा- वन्यजीव संरक्षण के नए आयाम, राजस्थान के शुभंकर जीव, ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में धधकती आग, अंगोरा- ऊन के लिए मासूम खरगोशों पर ज़ुल्म इत्यादि नई जानकारियों के साथ-साथ मेरे मन को व्यथित भी कर गया. इसी व्यथन के प्रसंगश: आज हम पूरी दुनिया में आई विपदाओं से मुँह मोड़ नहीं सकते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ-साथ भारत ने भी इसे महामारी और आपदा घोषित किया है. ऐसे में ‘विज्ञान प्रगति’ के माध्यम से इस महामारी के बारे में और इसके निदानार्थ कवितारूपी विचार प्रकट कर रहा हूँ, जो बिल्कुल सामयिक है और यह कोरोना पर पहली कविता है। इसके साथ ही मेरे द्वारा लिखित ‘कोरोना चालीसा’ की धूम भी है!

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विज्ञान प्रगति, दिसम्बर 2019 में कई प्रकाशित उपलब्धियाँ हैं, जिनमें नोबेल पुरस्कार 2019 के बारे में आमुख कथा है, जिनमें लेखिका ने विज्ञान के क्षेत्र में पुरस्कर्ताओं और उनके अवदानों के बारे में वर्णन की है । काश, वे भारतीय मूल के अर्थशास्त्री और उनकी पत्नी को मिले अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार के बारे में भी जानकारी देते ! विज्ञान प्रगति के इस अंक की दूसरी प्रकाशित उपलब्धि ‘भारतीय गणित : इतिहास के झरोखे से’ है । कभी विज्ञान प्रगति में मेरे भी दो गणितीय आलेख प्रकाशित हुए हैं, एक– ‘कुछ सोचनीय गणितीय उलझनें’ हैं, तो दूजे– ‘वैश्विक गणित में भारतीय गणितज्ञों की स्थिति’ नामक आलेख है । मुझे लगता है, दिसम्बर 2019 में प्रकाशित श्री मिलिंद साव के गणितीय आलेख तो मेरे प्रकाशित आलेख की द्वितीय कड़ी है । आलेख में प्राय: बातें पुरानी कही गई है । हाँ, कुछ नवीन जरूर है, परंतु आलेखक ने ‘अभाज्य संख्या’ को लेकर कई भारतीय गणितज्ञों के अवदानों को नहीं बताए हैं । सम्पूर्ण संसार के गणितज्ञ और थोड़े-बहुत गणित के जानकार भी ‘अभाज्य संख्या’ व प्राइम नंबर्स ज्ञात करने के नाम से परेशान और आक्रान्त रहा है, इस संख्या से आतंकित रहा है । भारत ‘संख्या-सिद्धांत’ व नम्बर थ्योरी के मामले में अद्भुत जानकार देश रहा है । वैसे इस दिसम्बर माह की 22 तारीख को महान भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन की जन्म-जयंती रही, जिसने 33 वर्षीय अल्प-जीवन में ही ‘संख्याओं’ पर प्रमेय दिए, जिनके जन्मदिवस पर हमारा देश ‘राष्ट्रीय गणित-दिवस’ भी मनाता है । इनके नाम पर कई संस्थाएँ और पुरस्कार हैं । परंतु ‘अभाज्य-संख्या’ पर इनका रिसर्च अधूरा ही रहा था। बाल्यावस्था से मैंने भी संख्या-सिद्धांत पर अनथक कार्य करते आया है । इस हेतु ‘सदानंद पॉल की गणित-डायरी’ का प्रथम संस्करण मात्र 11 वर्ष की अल्पायु में छपा था, तो द्वितीय संस्करण 1998 में प्रकाशित हुई थी, जिनमें Y2K समस्या के समाधान का भी जिक्र था । पाई का निकटतम मान 22/7 है, किंतु पाई के समानांतर मान 19/6 सहित फ़र्मेट के अंतिम प्रमेय की काट, नॉन कोपरेकर कांस्टेंट यानी यूनिक संख्या 2178 इत्यादि की खोज सहित हजारों प्रमेयों पर अनथक कार्य किया है । एक गणितीय प्रश्नों को ट्रिकी विधि से पहले 1600, फिर 5124 तरीके से बनाने भी शामिल हैं। वहीं अभाज्य संख्या जानने के तरीके पर 10 वर्षों से भी अधिक समयों से शोध-कार्य करते आया है । भारत के अधिकाँश विश्वविद्यालयों में नम्बर थ्योरी के जानकार नहीं हैं और उच्च तकनीक वाले कंप्यूटर बिहार के किसी भी विश्वविद्यालय में नहीं हैं, अन्यथा परिणाम और भी सटीक आता ! फिर भी मेरी गणित-डायरी गणित के सामान्य से सामान्य विद्यार्थी के हित में है । तभी तो गणितीय विश्लेषण में सम, विषम और अभाज्य संख्यायें प्रमुख भूमिका में होते हैं । ये कहा जाय तो गलत नहीं होगा कि यह तीनो संख्याओं के वजूद पर ही गणित के प्रमेय आधारित हैं, तो जीरो भी खुद में एक संख्या है, इसे आदिसंख्या भी कहा जाता है । वहीं रामानुजन ने 1729 नामक संख्या की खोज कर पूरी दुनिया में छा गए ! शायद अन्य विषयों में कमजोर रहने के कारण रामानुजन मैट्रिक पास भी नहीं कर पाए थे, जबकि आलेखक ने रामानुजन के मैट्रिक पास का जिक्र किये हैं । डॉ. गुणाकर मुले ने इस संबंध में श्रेयस्कर जानकारी दिए हैं । वहीं इस आलेख के लेखक ने यह भी गलत जानकारी दी है कि भास्कराचार्य के बाद से जिस भारतीय गणित का विकास अवरुद्ध हो गया था, उसे श्रीनिवास रामानुजन ने पुन: प्रशस्त कर दिया….; जबकि यह कहना गलत है, क्योंकि सिर्फ़ रामानुजन ने ही नहीं, अपितु हरीश चंद्रा, डी आर कापरेकर से लेकर डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह, प्रो. विनयकुमार कंठ, डॉ. बाल गंगाधर प्रसाद, डॉ. के सी सिंहा, प्रो. अजिताभ कौशल इत्यादि ने भी भारत गणितीय अन्वेषण को महत्वपूर्ण जगह पर पहुंचाए हैं । आलेखक मिलिंद जी द्वारा शकुंतला देवी के प्रमेयों, सूत्रों व फॉर्मूलादि का जिक्र भी तो किये जाने चाहिए थे । इसके साथ ही एक आग्रह है कि विज्ञान प्रगति को भारतीयों के प्राथमिक रिसर्च को भी प्रकाशनार्थ जगह देनी चाहिए। इस अंक की सम्पादकीय ‘सिंगल यूज प्लास्टिक मुक्त भारत’ एक मुहिम है, जिनके लिए  जनसरोकार सहित जनांदोलन की महती आवश्यकता है!
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विज्ञान प्रगति, अगस्त 2018 अंक पढ़ा. ‘अपनी बात’ (सम्पादकीय) से ‘रंगों’ और उनके इतिहास के बारे में जाना. रंगों के प्रति आकर्षण अनादि काल से है, हम भी स्वयं के बाल्यावस्था से ही फूलों और तितलियों के दीवाने रहे हैं. रंगों के कारण ही विविधरंगी ‘बुलबुल’ पक्षी सबके आकर्षण के केंद्र में रहा है. प्रकृति से मिले रंगों को लेकर ही बिहार के विश्वप्रसिद्ध ‘मधुबनी पेंटिंग्स’ की मौलिक अवधारणा तैयार हुई. प्राकृतिक रंगों की सीमित उपलब्धता और ब्रह्मांडीय बिम्बों से निःसृत किरणों की अनुलब्धता के कारण ही कृत्रिम रंगों के निर्मिति के तरीके ढूढ़ें गए. सम्पादकीय से ही जाना कि नील रंग के निर्माण पर ही एडोल्फ फोन को नोबेल पुरस्कार (1905) मिला था, तो सफेद और काला सबसे प्राचीन रंग नहीं है, बल्कि वो तो चटख गुलाबी रंग है, जो एक जीवाश्म से प्राप्त हुई है तथा जिनकी आयु 1.1 अरब वर्ष बताई गई है. इसके साथ ही प्रस्तुतांक की बड़ी उपलब्धि ‘जल संरक्षण’ पर आलेख है. भारतीय काव्यों में ‘बिन पानी सब सून’ उल्लिखित है, वहीं वर्षा व अन्य तरीके से प्राप्त जल का संरक्षण पोखर और गड्ढे का होना भी था. तभी तो दिल्ली, मुम्बई, पटना में जल-निकासी नहीं होने का कारण इन पोखरों व गड्ढे को भरकर मकान बनाया जाना भी है. इस अंक में लेखक अतुल अग्रवाल के विशेष लेख ‘आतंकवादी दीमक’ जहाँ इस कीट के बारे में, इसके पनपने के बारे में, इसके नियंत्रण और नष्ट किए जाने के बारे में सारगर्भित और उपयोगी लेख है. वहीं हल्दी और अमरूद के बारे में हम ग्रामीणों को पहले से ही जानकारी है, किन्तु इस संबंध में कुछ जानकारी अद्भुत है. लेख ‘अब गुब्बारों से मिलेगा इंटरनेट’ बिल्कुल नवीन और महत्त्वपूर्ण जानकारी लिए है. इस अंक में ‘शुक्र ग्रह का तूफान’ भी विशद आलेख है, क्योंकि शुक्र का यह तूफान कई रहस्य समेटे हैं. ‘विज्ञान प्रगति’ को वृहस्पति के तूफानों के बारे में भी अद्यतन जानकारी समेटे आलेख प्रकाशित करनी चाहिए. कुल मिलाकर यह अंक मुझ पाठक को बाँधे रखा।
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विज्ञान प्रगति, मई 2018 अंक पढ़ा। लेखिका सुश्री हेमलेट गुरिया का आलेख ‘कहानी हावड़ा ब्रिज की’ में कोलकाता अवस्थित हावड़ा और सियालदह को जोड़नेवाली ‘हावड़ा ब्रिज’ व ‘रवीन्द्र सेतु’ में अनेक ऐसी बिम्बों का वर्णन है, जिसे कम से कम मैं तो नहीं जानता था ! इस ब्रिज ने 3 फरवरी 2018 को निर्माण का 75 साल पूरा किया और जिसे प्रारूप से लेकर आधुनिक रूप तक पाने में लगभग 70 साल लगे, क्योंकि इस ब्रिज का प्रथम बार जमीनी हकीकत से आत्मसात 1874 में पोंटून फ्लोटिंग ब्रिज के रूप में किया गया था । इसे बनाने में  हाई टेनसाइल स्टील का उपयोग किया गया है, जिसे टिस्को ने उपलब्ध कराया था । जो अबतक खराब नहीं हुआ है । ‘हावड़ा ब्रिज’ शीर्षक से फ़िल्म भी बनी है । तो वहीं इसी अंक में लेखक अभिषेक कुमार सिंह के आलेख ‘स्टीफन विलियम हॉकिंग’ की प्रस्तुति बहुत सुंदर बन पड़ी है । सत्यश:, बहुचर्चित किताब ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ के लेखक महान विज्ञानी प्रो0 स्टीफ़न हॉकिंग, जिन्हें 21 की उम्र में डॉक्टरों ने कह दिया था कि वे 22वां जन्मदिन देख नहीं पायेगा, वो शख़्स डॉक्टरों की भविष्यवाणी को धता बता दिया और  दुनिया को ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ से परिचित कराया । वह इस ‘समय’ वाली दुनिया को छोड़ अपने जीवन में 55 साल और इजाफ़ा कर 14 मार्च 2018 को 76 वर्ष की आयु में एक ऐसे इतिहास की तरफ निकल गए, जिनकी कल्पना शायद वो ‘एलियन’ के रूप में भी कर लिया था ! अब भी दुनिया की बेस्ट सेलिंग किताबों में एक ‘द ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ (समय का संक्षिप्त इतिहास’ को मैंने भी खरीदा और पढ़ा है, जिनमें समय, अंतरिक्ष, दूरी और वेग को उन्होंने बारीकी से समझाया है । अष्टावक्र की भांति उनके भी सभी अंग दिव्यांग थे, किन्तु मस्तिष्क चिरंजीवी थी, यही कारण है हॉकिंग ‘अद्भुत व्हील चेयर’ पर बैठे -बैठे ही खगोलिकी सार -तत्व को अंतरतम से समझाया । उनसे उन सारे लोगों को सीख जरूर लेना चाहिए, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में मौत को आत्मसात करते -करते बच निकले, परंतु दुनिया को कुछ भी दे नहीं पाए । आज वे इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उनकी खोज मानवों के लिए सर्वोपरि है । हालांकि उन्हें जीते जी खूब सम्मान मिला । काश! उन्हें नोबेल सम्मान से नवाजा जाता ! प्रियजन का सदा के लिए चले जाना अत्यंत मर्मभेदी और दुखदायी होता है । इसी अंक में ‘पृथ्वी’ के बारे में स्मरणीय जानकारी भी प्रकाशित की गई हैं, जो सर्वोत्तम है, तो ‘मोबाइल’ के बारे में अनेक ऐतिहासिक तथ्यों से अवगत कराया गया है । इसप्रकार से प्रस्तुत अंक संग्रहणीय बन पड़ा है।
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विज्ञान प्रगति, अप्रैल 2018 अंक पढ़ा। सम्पादकीय विचार (अपनी बात) प्रेरक लगा। सत्यश:, बहुचर्चित किताब ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ के लेखक महान विज्ञानी प्रो0 स्टीवेन व स्टीफ़ेन हॉकिंग, जिन्हें 21 की उम्र में डॉक्टरों ने कह दिया था कि वे 22वां जन्मदिन देख नहीं पायेगा, वो शख़्स डॉक्टरों की भविष्यवाणी को धता बता दिया और  दुनिया को ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ से परिचित कराया । वह इस ‘समय’ वाली दुनिया को छोड़ अपने जीवन में 55 साल और इजाफ़ा कर 14 मार्च 2018 को 76 वर्ष की आयु में एक ऐसे इतिहास की तरफ निकल गए, जिनकी कल्पना शायद वो ‘एलियन’ के रूप में भी कर लिया था ! अब भी दुनिया की बेस्ट सेलिंग किताबों में एक ‘द ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ (समय का संक्षिप्त इतिहास’ को मैंने भी खरीदा और पढ़ा, किन्तु 10 बार पढ़ने के बाद भी समझ नहीं पाया है, बावजूद समय, अंतरिक्ष, दूरी और वेग को उन्होंने बारीकी से समझाया है । अष्टावक्र की भांति उनके सभी अंग दिव्यांग थे, किन्तु मस्तिष्क चिरंजीवी थी, यही कारण है हॉकिंग ‘अद्भुत व्हील चेयर’ पर बैठे -बैठे ही खगोलिकी सार -तत्व को अंतरतम से समझाया । उनसे उन सारे लोगों को सीख जरूर लेना चाहिए, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में मौत को आत्मसात करते -करते बच निकले, परंतु दुनिया को कुछ भी दे नहीं पाए । आज वे इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उनकी खोज मानवों के लिए सर्वोपरि है । हालांकि उन्हें जीते जी खूब सम्मान मिला । काश! उन्हें नोबेल सम्मान से नवाजा जाता ! प्रियजन का सदा के लिए चले जाना अत्यंत मर्मभेदी और दुखदायी होता है।

डॉ. सदानंद पॉल

एम.ए. (त्रय), नेट उत्तीर्ण (यूजीसी), जे.आर.एफ. (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार), विद्यावाचस्पति (विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ, भागलपुर), अमेरिकन मैथमेटिकल सोसाइटी के प्रशंसित पत्र प्राप्तकर्त्ता. गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स होल्डर, लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर, इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, RHR-UK, तेलुगु बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, बिहार बुक ऑफ रिकॉर्ड्स इत्यादि में वर्ल्ड/नेशनल 300+ रिकॉर्ड्स दर्ज. राष्ट्रपति के प्रसंगश: 'नेशनल अवार्ड' प्राप्तकर्त्ता. पुस्तक- गणित डायरी, पूर्वांचल की लोकगाथा गोपीचंद, लव इन डार्विन सहित 12,000+ रचनाएँ और संपादक के नाम पत्र प्रकाशित. गणित पहेली- सदानंदकु सुडोकु, अटकू, KP10, अभाज्य संख्याओं के सटीक सूत्र इत्यादि के अन्वेषक, भारत के सबसे युवा समाचार पत्र संपादक. 500+ सरकारी स्तर की परीक्षाओं में अर्हताधारक, पद्म अवार्ड के लिए सर्वाधिक बार नामांकित. कई जनजागरूकता मुहिम में भागीदारी.