कविता

पैर और पहिए

एक रास्ता था।
दो पैर थे।
चलते जाते थे।
रोज नया गीत गाते थे।
बड़े हुए फिर  रुके,
चलते चलते थके।
हजार हाथ वाले को पुकारा!!
उसने दो पहियों का दिया सहारा।
दो पैर अब बजाते जाते।
दो पहिए अब गीत गाते जाते।
पैर अब फिर थके,
बजाते बजाते रुके,
गीत खो गए।
उदास हो गए।
हजार आंख वाला आया।
जादू के पहिए लाया।
पहिए खुद गाते थे।
खुद ही बजाते थे।
अब दो पैर बैठे-बैठे चलते जाएं।
चैन की बंसी बजाए।
अब एक दिन फिर,
समय ने पलटा खाया।
बादल बरसते हुए आया।
ठंडी हवा साथ लाया।
पैर भीग कर रोने लगे।
अपनी खुशी वो खोने लगे।
चैन की बंसी छूट गई!
खुशी फिर से रूठ गई!
अबकी बार दया आई!!
पहिए के संग छत भी लाई।
अब पैर चौड़ा गए।
खूब वो खुद को फैला रहे।
पहिए अब घूमाते थे।
पैर आराम फरमाते थे।
पैर अब गुब्बारे हो गए।
मक्खन वालों को प्यारे हो गए।
अब बुझती न थी पैरों की प्यास।
हर पल पैरों को एक नई आस।
खुशी जाने कहां खो गई!
चैन  की बंसी चुप हो गई!!
अबकी आया फिर काल!!
पैर को साथ ले गया।
पहिए खड़े  रह गए।
पैर और पहिए का इतना ही दौर,
उनकी मंजिल और इनकी मंजिल और।
खुशी थी पैरों की मंजिल,
पर पैर पहियों में खो गए!
खुशी सामने खड़ी थी पर,
पैर पहियों में खो गए!
और पैर सो गए !!
और पैर सो गए!!!
—  सुनीता द्विवेदी

सुनीता द्विवेदी

होम मेकर हूं हिन्दी व आंग्ल विषय में परास्नातक हूं बी.एड हूं कविताएं लिखने का शौक है रहस्यवादी काव्य में दिलचस्पी है मुझे किताबें पढ़ना और घूमने का शौक है पिता का नाम : सुरेश कुमार शुक्ला जिला : कानपुर प्रदेश : उत्तर प्रदेश