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छठ लोकपर्व : विशुद्ध प्रकृति-पूजा

लोक आस्था व सूर्योपासना का महान पर्व ‘छठ’ यानी प्रकृति पूजा शाकाहार, आरवाहार, फलाहार इत्यादि आधारित पर्व है । हम इस पर्व की आस्था, अनास्था या जनमानस से उपजे गल्प या किसी प्रकार की सही पौराणिकता के ऊहापोह व मरीचिका में न आगोशित हो, इनकी वैज्ञानिकता पर जाते हैं । बारिश और बाढ़ के बाद असंख्य संख्या में आए कीड़े-मकोड़े हेतु पूर्ण अंधकार व अमावस्या में दीप जलाकर कीट-पतंग व मच्छरों को भगाने के तत्वश: विज्ञानसम्मत पर्व दीपावली के अगले दिन पशु-प्रेम के प्रासंगिक मवेशी की पूजा यानी गोबररूपी धन लिए गौ के विकास व (सं)वर्द्धन की पूजा की जाती है, फिर पक्षियों और गोबर-गोयठे को लिए छठ-गान आरम्भ हो जाती है।

प्रकृति की पूजा के विहित बाँस, गेहूँ, अरवा चावल, नारियल, टाभा नींबू, नारंगी सहित तमाम मौसमी फल एवं मिट्टी, जल, लतायुक्त सब्जी के विन्यस्त: पत्ता सहित मूली, पत्ता सहित अदरक, हल्दी, गाजर, सुतनी, शकरकंद, मिश्रीकंद, पानी सिंघाड़ा, चना, मटर, संस्कृतिनिमित्त खबौनी, ठेकुआ इत्यादि पूज्यनीय हो जाते हैं , यही तो प्रकृति की पूजा है । पृथ्वी जहां सूर्य के इर्द-गिर्द ही सम्मोहित है, उसी भाँति पृथ्वीवासी ये ‘छठव्रती’ भी सूर्य और नदी जल के साथ जुड़ाव लिए हैं । पूर्व चर्चा में आये विशुद्ध आहार को ही ग्रहित किये जाकर, किन्तु 36 घण्टे निर्जला उपवास जहां ‘योग’ के प्रसंगश: आज के दैहिक-जरूरी के लिए अति महत्वपूर्ण तत्व है । कार्तिक मास में सूर्यताप अत्यधिक कम हो जाती है, इसके विन्यस्त: कार्तिक शुक्ल षष्ठी को जलाच्छादित शरीर से सूर्य को अर्घ्य देने से शरीर में जल ‘क्रॉस’ कर सूर्यप्रकाश प्राप्त होने से शरीर रोगमुक्त होती है। परंतु हाँ, धरती घूमती है सूर्य की परिक्रमा के प्रसंगश: और एतदर्थ प्रकृतिपर्व सूर्योदय और सूर्यास्त में ‘अर्घ्य’ विन्यास को लेकर है ! ध्यातव्य है, वर्ष में चार बार छठ पर्व मनाए जाने का आख्यान है, किंतु कार्तिक शुक्ल षष्ठी के इतर चैत्र शुक्ल षष्ठी तिथि को मनाई जानेवाली छठ ज्यादा ही प्रसिद्धि प्राप्त है ।

ज्ञात हो, बिहार व झारखंड को छोड़कर दूसरे प्रान्त की पत्रिका में दो दशक पूर्व ‘छठ’ पर मेरे ही न्यूज़फीचर पहलीबार प्रकाशित हुई थी । लोक आस्था का महान सूर्योपासना पर्व ‘छठ’ मनानेवाले भारतीय राज्यों से इतर राज्य से इस पर्व के बारे में पहली बार छपा ‘दीपावली से छठ तक’ नामक शीर्षक समाचार राजस्थान से प्रकाशित राष्ट्रीय साप्ताहिक ‘आमख्याल’ के दिनांक – 09.12.1993 अंक में छपा था । खासकर ‘छठ’ पर मेरे द्वारा लिखित और प्रेषित इसतरह के रिपोर्टिंग की आयु अब 24 बरस हो गयी है । सम्प्रति वर्ष-2019 में भारत के लगभग 30 करोड़ आबादी ‘छठ’ लोकपर्व से प्रभावित होंगे ! यह कुल भारतीय मानवों के 4.3 वाँ हिस्सा है । मूलत: बिहार, झारखण्ड सहित पूर्वी उत्तर प्रदेश, प. बंगाल के उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र, नेपाल के मधेशी क्षेत्र में ‘छठ’ मनाये जाते हैं । विदेशों में मॉरीशस आदि में भी मनाये जाते हैं । भोजपुरी बेल्ट तो वृहद स्थिति लिए इस हेतु शामिल है । इन क्षेत्रों को छोड़कर जहाँ ‘छठ’ नहीं मनाये जा रहे हैं , वैसे राज्यों (राजस्थान) के राष्ट्रीय हिंदी अखबार ‘आमख्याल’ में इनसे सम्बंधित रिपोर्टिंग-फ़ीचर पहलीबार मेरी ही छपी थी । यह पर्व folk festival लिए विस्तृत क्षेत्र और आबादी को प्रभावित करता है।

‘छठ’ विशुद्ध रूप से शाकाहार, आरवाहार, फलाहार इत्यादि आधारित पर्व है । मैं इस पर्व की आस्था, अंध-आस्था, लोक-मानस से उपजे गल्प या किसी प्रकार की सही पौराणिकता के ऊहापोह व मरीचिका में न आगोशित हो, इनकी वैज्ञानिकता पर जाते हैं । …. वर्षा जल से आक्रान्त पोखर-तालाब, नाले-गड्ढे के सूखते रूप तथा भद्दापन लिए घर-दरवाजे को पूर्व रूप देते-देते व सफाई करते-करते कार्तिक अमावस्या आ जाती है और सनातन धर्मावलम्बी इस रात (अमावस्या के कारण अँधेरी) काफी संख्या में दीप प्रज्वलित कर कीड़े-मकौड़े-मच्छरादि को भगाने का प्रयास करते है, जो विज्ञान-सम्मत है । दीपावली के अगले दिन पशु-प्रेम के प्रासंगिक मवेशी की पूजा (गोवर्द्धन पूजा) की जाती है, फिर पक्षियों और गोबर-गोयठे को लिए छठ-गान आरम्भ हो जाती है ।

इतना ही नहीं, वाल्मीकि कारीगरों की कलाकृति बाँस की सूप, मौनी, डलिया इत्यादि , फिर पिछड़ी जातियों द्वारा उपजाए गए सामग्रियाँ इनमें शामिल होकर इस महौत्सव को चार-चाँद लगा बैठते हैं । आज हिन्दू के अतिरिक्त कई धर्मावलंबियों द्वारा ये पर्व मनाये जाते हैं , हमारे यहाँ इस्लाम और सिख आदि  धर्मावलम्बी भी मनाते हैं । पूरे अनुष्ठान में  सूर्य-पूजा को केंद्रित यह पर्व विज्ञान आधारित है । यह पर्व कर्मकांडी प्रवृत्ति से इतर बगैर पुरोहिताई की पूजा है !

माननीय प्रधानमंत्री श्रीमान् नरेंद्र दामोदर दास मोदी ने ‘छठ’ की महत्ता को अनोखे अंदाज़ में यूँ प्रकट किया-“सभी कोई उगते हुए सूरज की पूजा करते हैं, परंतु ‘छठ’ एकमात्र महौत्सव है, जहां डूबते सूरज की भी पूजा होती है ।” वहीं प्रो. शारदा सिन्हा के ‘छठ’ गीतों में प्रयुक्त ‘अभद्र’ शब्दों के गायन पर ‘बैन’ लगे ! विदित हो, सूर्योपासना और लोकआस्था का प्रकृति-पर्व ‘छठ’ के आते ही बिहार, झारखंड, पश्चिमी प. बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश, नेपाल इत्यादि अवस्थित श्रद्धालुओं द्वारा कैसेट, सीडी, मोबाइल, लाउडस्पीकर, साउंड बॉक्स इत्यादि के मार्फ़त ‘छठ’ गीत सुनने को मिलने लग जाते हैं। पहले पद्मश्री विंध्यवासिनी देवी, अनुराधा पौडवाल, फिर तो छैला बिहारी आदि के द्वारा गाई गई लोकगीतों को सुनी जा सकती थी । हालांकि यह अब भी है, किन्तु लगभग 3 दशकों से जिस प्रकार से ‘छठी’ मैया के लोकगीतों को लेकर ‘शारदा सिन्हा’ के गीतों की घर-घर चर्चा है, जिसे सुनते हुए ही बिहार सरकार ने 2009 में उन्हें ‘भोजपुरी की लता मंगेशकर सम्मान’ प्रदान की। किन्तु हर किसी को भारतरत्न लता मंगेशकर कह देने से ‘शारदा जी’ को लेकर अभिमानबोध गृहीत होती है । वैसे शारदा सिन्हा के बोल में न सिर्फ भोजपुरी, अपितु हिंदी, मैथिली, मगही, वज्जिका, अंगिका इत्यादि भाषाई भी शामिल हैं । जिसतरह से उनकी द्वारा गाई गयी छठी गीतों में कुष्ठ रोगियों के लिए अपशब्द- ‘कोढ़िया’, तो दृष्टिहीनों के लिए ‘अन्हरा’, जिन्हें संतान नहीं है, उस महिला को ‘बाँझ’, अनुसूचित जाति के लिए ‘डोमरा’ कह इनके कार्य ‘सुपवा’ को गीतों में पिरोया गया है, यह उक्त रोगी व जाति के लोगों को असम्मान करने के गुरेज़ से है।

इसके साथ बोधगम्य शब्दों को अशिष्ट रूपांतरण कर उच्चरित व गायनबद्ध की गई है । यही नहीं, भारतीय संविधान के अनुच्छेद-15 और 17 के साथ-साथ जब All things are bright & beautiful कहा जाता है, तब किसी को ‘कुरूपवा’ यानी कुरूप (ugly) कह ऐसे लोगों को उबारना नहीं, अपितु उनमें हीनभावना भरना ही कहा जायेगा । रही-सही कसर, शारदा सिन्हा के इन गीतों के माध्यम से छठी मैया से ‘पुत्र’ प्राप्ति की प्रबलतम इच्छा को उद्भूत कर ‘बेटी बचाओ’ अभियान को तिरोहित की जा रही है ! गीतों की लयबद्धता के कारण असाक्षर व्रतियों द्वारा ऐसी गीतों को सुनी जा रही है, किन्तु इन शब्दों की व्याख्या होने पर शब्दार्थ व भावार्थ समझ में आ जाते हैं । दोनों सरकारों द्वारा ऐसी गीतों के बाजन अथवा यथोक्त अभद्र शब्दों पर रोक लगनी चाहिए । इन शब्दों को कहा जाने में ‘डिक्टेटर’ की बू आती है, जो गीतों की शोभा व सजावट को खत्म कर रही है ! उनकी छठ गीतों में– ओ हो दीनानाथ, पहले-पहले छठी मैया, केलवा के पात पर, नदिया के तीरे-तीरे, उठहु सुरुज भेले बिहान, हे गंगा मैया, पटना के घटवा पर….. इत्यादि को सर्वप्रथम एच एम वी ने स्वरबद्ध किया, बाद में टी सीरीज ने । हालाँकि उन अभद्र शब्दों को छोड़ इन गीतों में लोक-संस्कृति की मधुरता पुनर्स्थापित हो जाती है । ध्यातव्य है, इन्हीं मधुरता के कारण ही प्रो. शारदा सिन्हा को भारत सरकार ने पद्मश्री और पद्मभूषण अवार्ड से सम्मानित किया है।

डॉ. सदानंद पॉल

एम.ए. (त्रय), नेट उत्तीर्ण (यूजीसी), जे.आर.एफ. (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार), विद्यावाचस्पति (विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ, भागलपुर), अमेरिकन मैथमेटिकल सोसाइटी के प्रशंसित पत्र प्राप्तकर्त्ता. गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स होल्डर, लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर, इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, RHR-UK, तेलुगु बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, बिहार बुक ऑफ रिकॉर्ड्स इत्यादि में वर्ल्ड/नेशनल 300+ रिकॉर्ड्स दर्ज. राष्ट्रपति के प्रसंगश: 'नेशनल अवार्ड' प्राप्तकर्त्ता. पुस्तक- गणित डायरी, पूर्वांचल की लोकगाथा गोपीचंद, लव इन डार्विन सहित 12,000+ रचनाएँ और संपादक के नाम पत्र प्रकाशित. गणित पहेली- सदानंदकु सुडोकु, अटकू, KP10, अभाज्य संख्याओं के सटीक सूत्र इत्यादि के अन्वेषक, भारत के सबसे युवा समाचार पत्र संपादक. 500+ सरकारी स्तर की परीक्षाओं में अर्हताधारक, पद्म अवार्ड के लिए सर्वाधिक बार नामांकित. कई जनजागरूकता मुहिम में भागीदारी.