धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

सिख-खालसा के प्रवर्त्तक : पटना साहिब वाया लक्ष्मीपुर साहिब

दुनिया भर में बसे सिख धर्म के अनुनायियों की निगाहें बिहार की ओर भी लगी रहती हैं। कहा जाता है, पटना सिटी में 350 साल पहले हिन्दू यादव जाति में जन्मे गोविन्द राय ही कालान्तर में सिख धर्म के 10 वें और अंतिम गुरु के रूप में गुरु गोविंद सिंह महाराज होकर सिख धर्म और खालसा पंथ को न केवल चँहुओर फैलाये, बल्कि  विदेशी मुगल आक्रांताओं के विरुद्ध लड़कर देश के लिए दो पुत्रों समेत स्वयं को होम कर दिए, किन्तु वे झुके नहीं।

जहाँ उनका जन्म हुआ, वो जगह पटना सिटी से पटना साहिब हो गये हैं और वहाँ आज हरिमंदिर साहेब नामक भव्य गुरद्वारे हैं, वहीं कुछ वर्ष पहले 3 से 5 जनवरी में बिहार सरकार का संस्कृति विभाग वैश्विक स्तर पर गुरु गोविंद सिंह महाराज के 350 वें जयंती समारोह व प्रकाश गुरुपर्व मनाये, तो इस हेतु लाखों अंतरराष्ट्रीय सिख श्रद्धालुओं के यहाँ आगमन हुए। समारोह के अंतिम दिन प्रधानमंत्री समेत पंजाब के मुख्यमंत्री भी आए। पटना के गांधीमैदान में भी लंगर की व्यवस्था थी । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश जी बधाई के पात्र हैं भी, किन्तु राज्यभर में  फैले गुरद्वारे और सिख गुरुओं के आगत अन्य स्थानों को भी चिह्नित कर इन्हें संरक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए।

ध्यातव्य है, वेब पत्रिका डेली हंट तथा हिंदुस्थान समाचार में प्रकाशित ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में गुरु गोविंद सिंह के पिता गुरु तेगबहादुरजी, जो सिख धर्म के 9वें गुरु थे– ने 17वीं शताब्दी में उन्होंने मुगल शासक द्वारा काश्मीरी पण्डितों तथा अन्य हिन्दुओं को बलपूर्वक धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बनाने का विरोध किया तो औरंगजेब ने उनका सिर कटवा दिया। विश्व इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेगबहादुरजी का स्थान अद्वितीय है। सिखों के आठवें गुरु हरिकृष्ण राय जी की अकाल मृत्यु की वजह से गुरु तेगबहादुरजी को सिख धर्म का 9वें गुरु बनाए गए । गुरु तेगबहादुरजी का जुड़ाव कटिहार जिला से भी रहा है। 1670 ई. की माघी पूर्णिमा में असम से पटना वापसी के क्रम में उन्होंने कटिहार जिले के बरारी प्रखण्ड स्थित कान्तनगर भवानीपुर में छह महीने रुककर गुरुमत का प्रचार प्रसार किया। यहां उन्होंने लोगों के आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक व उन्नयन के लिए कई रचनात्मक कार्य किए। आध्यात्मिक स्तर पर धर्म का सच्चा ज्ञान बांटा और कई जनकल्याणकारी आदर्श स्थापित करते हुए शांति, क्षमा, सहनशीलता के गुणों वाले गुरु तेग बहादुरजी ने लोगों को प्रेम, एकता, भाईचारे का संदेश दिया। सन 1749 ई. में कान्तनगर में गंगा नदी किनारे सिख समाज के लोगों ने उनकी याद में गुरु तेगबहादुर गुरुद्वारा साहिब का निर्माण करवाया। इस गुरुद्वारा साहिब में उनसे जुड़ी यादों को सहेज कर रखा गया। यह तीर्थ स्थान कटिहार जिला मुख्यालय से लगभग 40 किमी की दूरी पर अवस्थित काढ़ागोला रेलवे स्टेशन के पास है। 1857 ई. में गंगा के तेज बहाव व कटाव की वजह से यह गुरुद्वारा साहिब गंगा के गर्भ में विलीन हो गया, जिस वजह से यहां के लोगों ने ऐतिहासिक गुरुद्वारा की मिट्टी और उनकी यादों से जुड़े सामानों को बरारी प्रखंड के लक्ष्मीपुर स्थित सरदार नगर में रखा। इस गांव के श्रद्धालु हरबंश जी ने सरदारनगर में सात दिसम्बर 2014 को गुरु तेगबहादुर ऐतिहासिक गुरुद्वारा साहिब की नींव रखी। एक करोड़ 60 लाख रुपए की लागत से इस गुरुद्वारा साहिब का जीर्णोद्धार हुआ। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 14 दिसम्बर 2018 को नवनिर्मित गुरु तेगबहादुर गुरुद्वारा शिलपट्ट का अनावरण कर इसका उद्घाटन किया। अब यह गुरुद्वारा देश भर के सिख सर्किट से भी जुड़ गया है। इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे में गुरु गोविंद सिंह जी का हस्तलिखित ग्रंथ और हुक्मनामा भी संजोकर रखा गया है। पुरानी लिपियों और पुरातन महत्व के प्राचीन दस्तावेजों के दर्शन करने और उसपर मत्था टेकने के लिए देश-विदेश से प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में सिख श्रद्धालु यहाँ आते हैं। गुरु तेगबहादुरजी के जीवनकाल के घटना क्रम पर गौर करें तो देशभर में लोग मुगल शासक के अत्याचार से पीड़ित थे। अत्याचारी औरंगजेब के दरबार में ब्राह्मण आकर गीता के श्लोक पढ़ता और उसे उसका अर्थ सुनाता था, पर वह ब्राह्मण गीता में से कुछ श्लोक बीच-बीच में छोड़ दिया करता था। एक दिन वह ब्राह्मण बीमार हो गया और औरंगजेब को गीता सुनाने के लिए उसने अपने बेटे को भेज दिया। किंतु उसे उन श्लोकों के बारे में बताना भूल गया जिनका अर्थ वहां नहीं बताना था।उस ब्राह्मण बेटे ने वहां जाकर औरंगजेब को पूरी गीता का अर्थ सुना दिया, जिससे औरंगजेब को यह स्पष्ट हो गया कि हर धर्म अपने आपमें एक महान धर्म है।

सर्वविदित है, औरंगजेब खुद के धर्म के अलावा किसी और धर्म की प्रशंसा नहीं सुन सकता था। उसने अपने सलाहकारों से सलाह के बाद भारत में रह रहे सभी को इस्लाम धर्म अपनाने पर मजबूर करने लगा। अत्याचारी ने आदेश दिया कि सभी लोग इस्लाम धर्म कबूल करो या मौत को गले लगाओ। जब इस तरह की जबरदस्ती शुरू हो गई तो अन्य धर्म के लोगों का जीना मुश्किल हो गया। इस जुल्म के शिकार कश्मीर के पंडित गुरु तेगबहादुर के पास आए और उन्हें बताया कि किस तरह ‍इस्लाम धर्म स्वीकारने के लिए दबाव बनाया जा रहा है और न करने वालों को तरह-तरह की यातनाएं दी जा रही हैं। हमारी बहू-बेटियों की इज्जत को खतरा है। जहां से हम पानी भरते हैं वहां हड्डियां फेंकी जाती हैं । हमें बुरी तरह मारा जा रहा है। कृपया आप हमारे धर्म को बचाइए। गुरु तेगबहादुरजी ने उन पीड़ित पंडितों से कहा कि जाकर औरंगजेब से कह ‍दो ‍कि अगर गुरु तेगबहादुर ने इस्लाम धर्म अपनाना काबूल कर लिया तो हम भी कर लेंगे। औरंगजेब ने इस बात को स्वीकार कर लिया। गुरु तेगबहादुरजी दिल्ली में औरंगजेब के दरबार में स्वयं चलकर गए। वहां औरंगजेब ने उन्हें इस्लाम धर्म अपनाने के लिए तरह-तरह के लालच दिए। किंतु बात नहीं बनी तो औरंगजेब ने उन्हें कैद कर लिया गया।उनके दो शिष्यों को मारकर उन्हें डराने की कोशिश की, पर गुरु तेगबहादुरजी टस से मस नहीं हुए।उन्होंने औरंगजेब को समझाया कि तुम्हारा धर्म भी यह शिक्षा नहीं देता कि दूसरे धर्म के लोगों पर जुल्म कर धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया जाए। अगर तुम जबरन दूसरे धर्म के लोगों को इस्लाम धर्म काबूल करने के लिए मजबूर कर रहे हो तो यह जान लो कि तुम खुद भी सच्चे मुसलमान नहीं हो। यह बात सुनकर औरंगजेब ने गुस्से से तमतमाते हुए दिल्ली के चांदनी चौक पर 11 नवंबर 1675 ई. को गुरु तेगबहादुरजी के शीश काटने का हुक्म दे दिया और तेगबहादुरजी ने हंसते-हंसते अपना शीश कटाकर बलिदान दे दिया। इसलिए गुरु तेगबहादुरजी की याद में उनके शहीदी स्थल पर एक गुरुद्वारा स‍ाहिब बना है, जिसका नाम गुरुद्वारा शीश गंज साहिब है। गुरु तेगबहादुरजी का बलिदान न केवल धर्म पालन के लिए, अपितु समस्त मानवीय सांस्कृतिक विरासत की खातिर बलिदान था। हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए वे शहादत देने वाले एक क्रांतिकारी युग-पुरुष थे। उनके जीवन का प्रथम दर्शन यही था कि ‘धर्म का मार्ग ही सत्य और विजय का मार्ग है।’ गुरु तेगबहादुरजी में ईश्वरीय निष्ठा के साथ समता, करुणा, प्रेम, सहानुभूति, त्याग और बलिदान जैसे मानवीय गुण विद्यमान थे।