उपन्यास

गर्ल्स हॉस्टल में रात (उपन्यास)

…….मनोमस्तिष्क में रोने, बिलखने, सिहरने, चिंघाड़ने और दहाड़ने की आवाज कई दिनों से आ रही थी. कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था । अपना संतुलन जवाब दे रहा था. ऐसा था कि मानो कोहराम-सी मच गई थी, मनोमस्तिष्क में……

धाड़-धाड़, साँय-साँय, मार-काट, बम-ब्लास्ट इत्यादि के स्वर यथावत थे. जिंदगी पिरो-सी गई थी माला में– गूँथने के क्रम में. आशा और अपेक्षा एकसाथ आपस में उलझ गया था. सम्पूर्ण अस्तित्व अस्थिर हो चुका था. उलझन और तनाव तो अलग ही हावी थे. सान्निध्य की कसौटी दूर की कौड़ी साबित हो रही थी और मैं और मेरे हालात अदनाई लिए रह गया था, अंतिम असफलता पाकर….

…..फ्रायड के विचारों को समेटे मैं पूरे महाविद्यालय में अभी तो प्रथम वर्ष का ही छात्र था कि मेरी फिलोसॉफी अंतिम वर्ष के छात्र और छात्राओं के बीच प्रमुखतम स्थान पा चुका था । अपने उच्च दर्शन के बूते नवपन के अहसास के साथ दर्शनशास्त्र में ‘न्यू थ्योरी’ मेरे नाम के साथ जुड़ने लगे थे ! बर्ट्रेंड रसेल के विचारों को जीने लगा था । रसेल की किताब ‘इंट्रोडक्शन टू मैथेमैटिकल फिलोसॉफी’ को दिलरुबा बना लिया था, किंतु सस्ती लोकप्रियता बटोरना तनिक भी अच्छा नहीं लगता था । रसेल के बाद जैनेंद्र और अज्ञेय की कहानियों, उपन्यासों में गोते लगाया करता था।

तयशुदा सच है कि मौन के संप्रति क्यों किसी के गुलाम रहे लोग ? अपने में खोए रहना एकमात्र चाहना रह गई थी ! मैं सीधा-सपाट  कहने के भावार्थ समेटे रसिया मिज़ाज़ से मीलों दूर रहकर निर्जन वन में सम्मोहक जरूर बना रहा ! न मेरा दर्शन कातिल था, न मैं ! निगाहों से भी मैं दूर-दूर तक कातिल नहीं ! प्रकृति की संपूर्णता मेरे दर्शन में न सिर्फ टिकी हुई थी, अपितु टिकटिकी लगाए हुए भी थी ! हाँ, एक छवि समेटा था मैं । फिकरे होते थे मेरे लिए…… ख़ैर, ज्यादा बड़ाई ठीक नहीं ! जाँच हुई मेरी यानी मुझमें समाहित टैलेंट की । यूनिवर्सिटी कार्यालय में । यही टैलेंट पूरे यूनिवर्सिटी में फैल फैल जो गयी थी । मैंने कोई गुनाह नहीं किया था । बस, छोटी उम्र में अभयशंकर की गर्वित जिज्ञासा लिए था जो !

…..और फिर मुझे अंतिम वर्ष की परीक्षा में सम्मिलित होने का आदेश पारित हुआ । मैंने वर्गोंन्नति पाई यानी परीक्षा परिणाम मेरे पक्ष में रहा, टॉपर कहलाया, किंतु गर्वता को कोई स्थान नहीं दिया मैंने ! परिजन और प्रियजन मिलने को आने लगे थे, किंतु मैं अपने में खोया रहा था, कुछ पाने, कुछ देने, कुछ कसकने को !

पहनावे को मैं सिर्फ 2 जोड़े फुलपैंट-शर्ट ही रखा था मैंने । एक जोड़े शरीर के साथ, दूसरी जोड़ी पीठ पर लड़नेवाली बैग के अंदर । अत्याधुनिक सुविधा से वंचित एक लॉज में रहता था, ताकि किराया कम देना पड़े । इसबार की डीपी में पिताजी ने कुछ अधिक रुपये मनीऑर्डर कर दिए थे, ताकि जीन्स-टीशर्ट खरीदी मैं ! …..किंतु पहनावे से दर्शन उच्च थोड़े होते हैं, इसलिए उन अतिरिक्त रुपयों की मैंने दर्शन की पुस्तकें खरीद लिए थे ! जीन्स-टीशर्ट पहनने का विचार तब भी मन में नहीं था, आज भी नहीं है।

सीनियर और जूनियर छात्राएँ भी आने लगी थी, प्रश्न पूछने के बहाने और कुछ कहने, और कुछ सुनने-सुनाने, किंतु मुझे किसी के भी फालतू बातों में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं रहती थी । यह नहीं था कि मैं साधु था या कोई आडम्बरयुक्त व पाखंडी विचारों को गृह किये था, अपितु मेरे किस्से तो साफ़गोई का पेस्ट चस्पाये था। यह भी नहीं था कि मैं ‘यौन’ शब्द से अनभिज्ञ था, किंतु कुत्ते-कुत्ती, बकरे-बकरी, घोड़े-घोड़ी, साँड़-गायें, सूअर-सुअरी तक ही सीमित मानता था । पौरुषेय और नारीत्व के दर्शनों में ये यौन शब्द कहाँ से आ जाते हैं ! शायद अंदर की संवेदना इसकी इजाजत भी नहीं देता था…. पीजी में मुझे गोल्ड मेडल मिला और पिताजी के पत्र भी उसी दिन प्राप्त हुए कि अब competition की तैयारी करो, मैं रिटायरमेंट होनेवाला हूँ…..

लड़खड़ाती ट्रेन मोकामा जंक्शन पर जिंझांगति हुई रुकी और चिचियाती पहिये के रुकने के साथ मेरी विचारतंद्रा भंग हुई । मैंने निःशब्द हो अपनी साँसों को नाक के दोनों छिद्रों से बिना ब्रेक छोड़ दिए और रिजर्वेशन बर्थ पर दोनों पैरों को समेटते बैठ गया । घड़ी तो मैं पहनता नहीं था, किंतु रात गहरी होने की अंदेशा जरूर थी । सभी यात्री सो ही रहे थे, कुछ के खर्राटे की घुड़की में कुछ के खाँसने की आवाज कुंद हो गयी थी ।सामने की बर्थ पर मेरी छोटी बहन ‘अनुजा’ सो रही थी । मेडिकल की प्रतियोगी छात्रा थी और आईएससी पिछले वर्ष बाइज्जत निकाली थी, मुझसे 6 साल छोटी थी…..

वाशरूम से आकर अपनी बर्थ पर फिर लेट गया । ट्रेन अबतक रुकी थी, किंतु मेरी स्वप्निल विचार मानस पटल पर टाइप करने लगे थे….. एक-एक competition असफल होते जा रहा था कि शहरयार साहब के शे’रों में–
‘मेरे हिस्से की जमीन बंजर थी,
मैं वाकिफ न था;
बेसबब इल्ज़ाम देता रहा,
बरसात का !’

एक सहृदय फिलॉसफर केवल फलसफ़ा के बूते क्या कर सकता है भला ? ….

(क्रमश:)