आत्मकथा

सारिका भाटिया की कहानी – 6

(22) 2010 में पहली नौकरी

अभी मेरी तलाक की प्रकिया चल रही थी। मैं बहुत गुमसुम थी, कुछ समझ नहीं आ रहा था। मुझे पापा और मेरे छोटे भाई ने संभाला। जगह जगह नौकरी के लिए इंटरव्यू भी दिया था। पर मेरी विकलांगता के कारण सबने मना कर दिया। मेरे पापा मुझसे एक बात बोलते थे- बेटी बोल्ड (साहसिक) बन जाओ। मुझे ये समझ नहीं आया कि बोल्ड कैसे बनते हैं। मेरा व्यवहार सबसे अलग रहा। मैं थोड़ी शर्मीली और डरपोक रही। काफी चुप और गम्भीर रहती थी। कोई मुझसे कुछ बोलता था, तो आगे जबाब नहीं दे पाती थी। पापा ने समझाया भी कि बोल्ड का मतलब होता है कि कोई आपके साथ बुरा करे, तो उसको जबाब दे। लेकिन मुझसे यह नहीं हो पाता था। मुझे पापा नौकरी के लिए दिल्ली से कहीं दूर भी नहीं भेजना चाहते थे। उन्होंने एक अखबार में यूरो किड्स प्लेस्कूल की नौकरी का विज्ञापन देखा। पापा ने मां को कहा कि एक बार यहां जाकर कोशिश करें, घर के पास ही है। मैंने टीचिंग का कोई कोर्स नहीं किया था। बस मेरे पास उद्यान केयर में टीचिंग का अनुभव था।

मैं मानसिक तनाव से बहुत परेशान थी। मेरी मां ने कहा- विश्वास करो, जरुर नौकरी मिलेगी। मेरी मां मुझे ले गयी उस स्कूल में। मेरा इंटरव्यू हुआ। उन्होंने मेरे शिक्षा और अनुभव के सर्टीफिकेट देखे। उन्होंने मेरा उद्यान केयर का अनुभव सर्टीफिकेट देखा। देखने के बाद उन्होंने मुझसे कहा- पढ़ाने की रिक्ति (वेकेंसी) नहीं है। पर डेकेयर टीचर की रिक्ति है। उन्होंने पूछा- आप ये काम कर सकती हैं क्या? मेरे मन में ईश्वर की शक्ति की आवाज थी। मैंने कहा- हां। लेकिन मुझे डर भी था कि मुझसे यह काम होगा या नहीं। पर वेतन 2000 दे रहे थे। मेरी मां ने कहा- कर लो ये काम, मौका है। लेकिन मैंने कहा कि सेलरी कम है। स्कूल वाले ने कहा- आप हमें जबाब देना कि आप ये नौकरी के लिए तैयार है या नहीं। मुझे समझ नहीं आया कि क्या करुं। घर आकर पापा को बताया। उन्होंने कहा जो सैलरी मिली है तैयार हो जाओ। इस नौकरी के लिए मना मत करो। मैं मान गयी थी। स्कूल वाले तो मुझे अपनी नौकरी मे लेने को तैयार ही थे। इस तरह मैंने वहाँ काम शुरू कर दिया।

(23) यूरोकिड्स प्लेस्कूल का अनुभव

डेकेयर का मतलब होता है कि मां बाप नौकरी पर जाते हैं और बच्चों को दिनभर के लिए वहाँ छोड़ जाते हैं। यह मेरे लिए नया काम था। तब तक मैंने बच्चों को नहीं संभाला था। स्कूल वाले ने पहले मेरा काम देखा एक हफ्ते कि मैं कैसा काम कर रही हूं। वहां की टीचर ने मेरा सहयोग दिया। लेकिन उन टीचर को नहीं पता था कि मुझे कान की परेशानी है। बाद में पता चल गया था। लेकिन उन्होंने मेरे काम की तारीफ की। एक हफ्ते काम करने के बाद वहां की इंचार्ज ने बुलाया। मुझे काफी घबराहट हो रही थी कि क्या बात है, शायद उनको मेरा काम पसंद नहीं आया। बुलाया तो टीचरों की अटेंडेंस के लिए था, जिसमें मेरा नाम लिखना था। वह तो मेरे लिए खुशी की बात थी। प्ले स्कूल में 12 बजे से शाम के 6ः30 बजे तक ड्यूटी थी। घर के पास था, पैदल चलने लायक दूर था। मैंने मम्मी-पापा को बताया, तो खुश हुई। स्कूल की टीचर भी बहुत अच्छी रही हैं। सहयोग बना रहा । डेकेयर के लिए काफी मदद की। आज भी उनसे मेरा संपर्क रहता है।

पर स्कूल के समय एक दिन टीचर से पूछा- आपको ऐसा क्या पसंद आया मेरे व्यवहार में? उन्होंने कहा- आपकी सादगी, आप में दया है। आप बच्चों को प्यार से बात करेंगी और संभाल लेंगी। मैं उनके लिए नयी थी। यह मेरी पहला जॉब था। यह जॉब 2013 तक रहा। स्कूल वाले मेरे काम से प्रभावित थे। कुछ महीनों के बाद मेरी सैलरी बढ़ा दी। मेरे काम से प्रभावित होकर उन्होंने मुझे सुबह की पाली में बच्चों को पढ़ाने का काम दिया। साथ में डेकेयर का भी काम देखती थी। मेरा सुबह 9 से 12 बजे तक पढ़ाने का काम था। दोपहर 12 से 6 बजे डेकेयर की ड्यूटी करना था। इस काम में मैं बहुत व्यस्त रही, जिसके कारण अपने दुःख को भुला चुकी थी। मुझमें बहुत आत्मविश्वास बन चुका था। मैं इतना कहूँगी कि जब एक रास्ता बंद होता है, तो ईश्वर अनेक रूपों में कई रास्ते खोल देता है।

(24) प्राइमरी टीचर ट्रेनिंग

2011 में तलाक हो गया था। उसी समय मेरे नानाजी का भी निधन हुआ था। मेरे नानाजी मुझे बहुत प्यार करते थे बचपन से। हमेशा मेरे को बोलते थे कि सारिका बहुत बड़े दिल वाली है। अक्सर मैं बहुत कम बोलती थी। बातें कम काम ज्यादा। स्कूल और कालेज काफी बच्चे मुझे गलत समझते थे। मेरे कम बोलने से मुझे घमंडी समझते थे। लेकिन मेरे नाना-नानी मुझे समझते थे अच्छे से। शादी की घटनाएं जो मेरे साथ हुआ उनको दःुख था, लेकिन मुझे हौसला देते थे हमेशा।

मैंने डेकेयर स्कूल का काम जारी रखा। मेरे स्कूल के टीचर ने कहा कि प्राइमरी टीचर ट्रेनिंग का कोर्स करलो। काम आयेगा आगे। मेरी टीचर ने भी किया था। 2012 की बात है। सप्ताह में एक दिन जाना होता था। स्कूल की नौकरी साथ चल रही थी। प्राइमरी टीचर ट्रेनिंग बहुत मेहनत का काम रहा। क्योंकि इसमें ड्राइंग बनाना होता था। यह शौक भी था मेरा। जब मैं 6 क्लास में थी। मेरी क्लास टीचर आशा गुप्ता ड्राइंग टीचर थीं। उनको देखकर मुझे ड्राइंग का शौक रहा। मुझे याद है कि पढ़ाई में बहुत कमजोर थी, माक्र्स कम आते थे। लेकिन ड्राइंग और आर्ट एंड क्राफ्ट में अच्छे माक्र्स आते थे। गर्मी की छुट्टियों में खाली समय में ड्राइंग करती थी। आज भी शौक है। मैं श्री कृष्ण और अन्य बहुत ड्राइंग बनाती थी। आज ये आदत छूट गयी है। बहुत व्यस्त हो गई थी, क्योंकि यूरोकिड्स स्कूल जाना और घर आकर प्रोजेक्ट बनाना। इसमें भी मैं प्रथम श्रेणी से पास हुई। आज भी प्राइमरी टीचर ट्रेनिंग की सब फाइल पड़ी हूई हैं, जिसमें ड्राइंग बनाया था। यह मेरे लिए काफी सौभाग्य रहा। उधर यूरोकिड्स प्लेस्कूल के बच्चे मुझे बहुत प्यार करते थे। पर मुझे यह जानकारी हो गई थी कि दुनिया इतनी चालाक है।

(25) 2013 में पुनः शादी

समाज में नियम है कि लड़कियां परायी होती हैं। कब तक मां बाप के पास रहेगी। मेरे मम्मी पापा तो नहीं करना चाहते थे। मैंने बड़ी मुश्किल से अपने को संभाला। मैं नौकरी भी कर रही थी। मेरे परिवार वाले पीछे पड़े हुए थे। समाज भी बहुत कुछ बोल रहा था। मैं मजबूत तो हो चुकी थी पर इतनी नहीं। मुझे बात माननी पड़ी। इस बार कोई गलती नहीं करना चाहती थी। इसलिए खूब सोचकर निर्णय लिया। रिश्तेदारों से भी रिश्ते आ रहे थे। मैं परेशान थी कि कौन सा सही लडका है। चाहने वाले बहुत आ रहे थे, क्योंकि मैं आत्मनिर्भर बन चुकी थी उस वक्त। मेरे पापा ने अखबार से भी बहुत देखा।

पहले जिस लड़के से मेरी सगाई और शादी हुई थी, वो नॉर्मल था। अब जिससे मेरी शादी हुई थी वह विकलांग लडका था। लेकिन गलती इस बार मुझे हुई थी जिसको मैंने सही समझा वो गलत था। जिसको मैंने गलत समझा था वह सही था। आज पछता रही हूँ बहुत। सही-बुरा समझने में गलती हो गई थी उस वक्त। लेकिन जो होना था वो मेरा भाग्य। इसे कोई रोका नहीं सकता था। मुझे लगता है कि ईश्वर मुझे ठोकरें झेलना सिखाना चाहता है, मजबूत बनाना चाहता है। ईश्वर की मर्जी से ही सब होता है।

विकलांग लडके के बारे में पापा ने अखबार में देखा था। लेकिन उन लोगों ने शादी से पहले झूठ बोला सब। वो मुझे शादी के बाद पता चला। आजकल दुनिया भी बहुत चालाक है। सिर्फ अपने फायदे के लिए काम करती हैं। शादी एक खेल बना दिया है। जब चाहो छोडो और निकल लो। पर शादी से पहले पापा को बोला था कि इस बार मैं निर्णय लूंगी कि किससे शादी करूंगी। साथ-साथ पापा से भी पुछती थी। विकलांग लडके के बारे में मैंने जाना तो मुझे सही लगा। लेकिन पापा को वह पसंद नहीं था। उन्होंने मुझे बहुत समझाया था, पर मैं नहीं मानी। मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी थी। हारकर उन्होंने मेरी बात मानी। पापा को पता था कि ये बहुत गलत लोग हैं। रिश्ता पक्का हो गया था। जब रिश्ता पक्का हुआ तो मेरे पापा की तबियत खराब थी। 25 नवबंर को शादी हो गई थी। इसके बाद नौकरी भी छोडनी पड़ी।

परिचय - सारिका भाटिया

जन्म तिथि-08/11/1980 जन्म स्थान- दिल्ली पिता का नाम- late भोज राज भाटिय़ा मां का नाम- नीलम भाटिया भाई- दो भाई शैक्षणिक योग्यता- (1) बीए (ऑनर्स) राजनीति विज्ञान दिल्ली यूनिवर्सिटी मैत्रेयी कॉलेज 2002 (2) एम ए (राजनीति विज्ञान) दिल्ली यूनिवर्सिटी दौलत राम कॉलेज 2004 (3) Bachelor of Library and Information Science (BLIS) IGNOU 2005 (4) Cerficate in Computing IGNOU 2006 (5) Primary teachers Training course 2013 Delhi अनुभव- (1) Teacher ( Udayan Care (NGO) 2004, 3 साल काम किया। (2) Insurance agent Hdfc 2005 -2007 (3) Daycare day boarding teacher Eurokids playschool Delhi Mayur vihar delhi 2010- 2013 वर्तमान में- 1) उपप्रधान (बाह्य), विकलांग बल 2) अध्यापिका, (गरीब बच्चों को पढाना), निर्भेद फाउंडेशन गाजियाबाद ईमेल - sarika1980@gmail.com रुचियाँ - (1) पढ़ना, (2) बच्चों को पढ़ाना, (3) गाना, आध्यात्मिक संगीत सुनना, (4) समाज सेवा (5) ड्राइंग पेंटिंग, anchor stitch kits,art and craft , (6) सकारात्मक विचार (positive thought) पढ़ना।

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