लघुकथा

भंवर

”तुम और किसी द्वारा नहीं, अपनी महत्वाकांक्षा द्वारा ही हार गए हो!” उसे एक आवाज सुनाई दी.

”तो क्या इस हार का ठीकरा मेरे सिर पर फोड़ोगे?” खिन्न होकर उसने पूछा.

”नहीं, अब तो तुम उस लायक भी नहीं बचे हो. ठीकरे को भी वायरस लग जाएगा और फिर यह और अधिक फैलकर भयंकर होता जाएगा.” जवाब मिला.

”तुम कहना क्या चाहते हो? साफ-साफ कहो.” शायद उसमें स्पष्ट सुनने का धैर्य उदित हो चुका था.

”परमशक्ति ने तुम्हें विवेक देकर पैदा किया था, तुमने अपने विवेक से अनेक आविष्कार किए. तुमने कम्प्यूटर भी बनाए. फिर उनको हैक करना भी सीख लिया. अब यही तुम्हारी शत्रुता का प्रमुख साधन बन गया. ‘वि’ से विवेक की प्राप्ति करके तुम वि’ से विकास के स्थान पर अब ‘वि’ से विनाश की ओर चल पड़े हो.”

”इसे विवेक का अतिरेक भी तो कहा जा सकता है न!” उसका तर्क था.

”बिलकुल. तुम्हारे इसी विवेक के अतिरेक ने ही तो लैब में वायरस बनाया और अब वही वायरस तुम्हें निगलता जा रहा है.” आवाज में खिन्नता स्पष्ट थी.

”लेकिन मैं इससे पार भी पा लूंगा. हौसले भी किसी हकीम से कम नहीं होते हर तकलीफ में ताकत की दवा देते हैं.”

”बस, इस हौसले को अपनी महात्वाकांक्षा न बनने देना मित्र. महत्वाकांक्षा विवेक को टिकने नहीं देती.”

उसे महत्वाकांक्षा के भंवर से खुद निकलने देने को छोड़कर आवाज किसी और मित्र को को महत्वाकांक्षा के भंवर से निकालने चल पड़ी थी.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “भंवर

  1. महात्वाकांक्षा के भंवर से निकलने में गर्म मौसम भी कोई सहायता नहीं कर सकताब बस हमें अपने वि’ से विवेक से काम लेना होगा, वि’ से विकास करना होबा, वि’ से विनाश से बचना होगा. वि’ से विवेक से काम लेकर हमें अपनी हर्ड इम्युनिटी को विकसित करना होगा. डी में पाया गया कि मौसम का प्रभाव तभी पड़ता है जब बड़ी आबादी में वायरस के प्रति पहले ही इम्युनिटी (हर्ड इम्युनिटी) विकसित हो चुकी है। कोविड-19 के बारे में ऐसा नहीं है. वायरस के प्रति अपनी हर्ड इम्युनिटी को बढ़ाओ और महात्वाकांक्षा और कोरोना के भंवर से निजात पाओ.

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