लघुकथा

तपस्या

कोरोना—लॉकडाउन—–Work From Home—–क्वारन्टीन—यही सब चल रहा है.

लॉकडाउन के कारण एक तरफ जहां ज्यादातर लोगों को अपनी नौकरी का डर सता रहा है वहीं कुछ लोग और खासकर युवा वर्क फ्रॉम होम की मार से ग्रसित हैं. काउंलर्स के पास आजकल नेगेटिव थॉट्स, एंग्जाइटी और स्ट्रेस के मरीजों की संख्या बढ़ गई है.

गौरव भाई भी नेगेटिव थॉट्स, एंग्जाइटी और स्ट्रेस से अछूते नहीं रह पाए हैं.
रात को सवा दस उनका मैसेज आया, ”आदरणीय दीदी सादर प्रणाम🙏🙏🙏🙏🙏. मैं थोड़ी उलझन में फंस गया. 10 तारीख को हरिद्वार वापस आया और आते ही मुझे 28 दिन के लिए होम क्वारन्टीन कर दिया गया. दूसरी स्टेट उत्तराखंड से आया था.” उनका अवसाद स्वाभाविक था.

”भाई, फासले से रहिए, पर खुश रहिए.” हमने माहौल को हल्का करने की कोशिश की.

”यहाँ इतनी समस्या हो गयी है कि सुबह 9 से 6 तक तो ऑफिस के काम ही नहीं निपटते. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और टेली कॉन्फ्रेंसिंग से काम करना पड़ रहा है. ऊपर से ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर भी खुद ही बनाना पड़ रहा है.” समस्या सचमुच गंभीर थी.

”अब तो उलझनों को ही जिंदगी समझना होगा. कोरोना जल्दी तो निपटने वाला नहीं लग रहा.”

”जी वो तो है,” गौरव भाई भी सहमत थे, ”लेकिन क्वारन्टीन के चक्कर में लोड ज्यादा हो गया है. ऑनलाइन काम में इतना प्रेशर हो जाता है दीदी कि और कुछ करने का मन ही नहीं करता. ऊपर से घर में अकेले बन्द बन्द समय काटना बहुत भारी हो रहा है. अभी तो 7.06.2020 तक चलने वाला है.”

”परीक्षा की घड़ी है. बंद में ही तो खुश रहने का मजा लेना है. वर्तमान के मजे लीजिए, वक़्त कैसा भी हो गुज़र जाता है. खुशनुमा हो या गमजदा गुज़र जाता है. हम ही नहीं चल पाते साथ इस के, यह तो सब का साथ निभाता है.”

”बहुत भारी हो रहा है.” गौरव भाई का भारीपन मुखर था.

”आप हल्के हो जाइए.” हल्का करने की हमारी कोशिश जारी थी.

”बोझिल है दीदी सारा दिन लैपटॉप में आँखें फोड़ना.” बात तो सही थी.

”गौरव भाई, आप सही कह रहे हैं. हर चीज की सीमा होती है. पर भाई, हम तो आपको खुद आजमाए गुर बता रहे हैं.” हल्का करने की हमारी कोशिश जारी थी.

”जी दीदी, 28 दिन सोच सोच कर टेंशन होती है. ना कहीं जा सकते ना कोई घर आ सकता.”

”हर दिन कुछ नया लेकर आता है. हम भी ना कहीं जा सकते ना कोई हमारे घर आ सकता है. सबके साथ ऐसा ही है.”

”जी वो तो है. 9 से घर पर ऑफिस बन जाता है. दिन में लंच करने तक का समय नहीं मिलता क्योंकि बनाने का समय नहीं.”

”लंच करने तक का समय नहीं मिलना भी एक तपस्या है.”

”जी वो तो है, लेकिन अकेले में उलझन होती है.” गौरव भाई की समस्या थी.

”आप उलझन से उलझ जाइए, उलझन सुलझ जाएगी.” हमारा निदान था.

”आपसे बात हुई तो थोड़ा अच्छा लगा.” गौरव भाई कुछ हल्के-से लगे.

”पता नहीं लोग कैसे कहते हैं, कि घर से काम आसान होता है.” भारीपन शायद अभी इतनी जल्दी जाने वाला नहीं था.

”बहुत मुश्किल है, हमने अपने बच्चों को घर से काम करते हुए देखा है.” हमारा अनुभव था.

”मुझे तो ये अनुभव हो गया 9 दिनों में ही घर पर जिम्मेदारियां और काम का बोझ सब 4-5 गुना ज्यादा बढ़ जाता है.”

”सही बात है, मां ने आपको 9 महीने—-” हल्का करने की हमारी एक और कोशिश थी.

”माँ के त्याग और उसकी ममता का अगर एक पुरुष 1% भी हो जाये तो उसका जीवन धन्य हो जाये. एक माँ ही तो है जिसकी ममता और त्याग सभी आयामों से भी परे है.” गौरव भाई मां की तपस्या में खो गए थे.

”धन्य हैं आप और आपकी तपस्या! वक्त की नजाकत को समझिए और चै से सो जाइए.” समयानुकूल हमारा परामर्श था.

”मैं धन्य नहीं, मैं भाग्यशाली हूँ. मैं धनवान हूँ जो मुझे आप जैसी मार्गदर्शिका मिली, माता-पिता से असीम प्रेम और दूसरों से प्रेम करने की शिक्षा मिली, स्नेह और आशीष देने वाले अनेक अपनों का साथ और सान्निध्य मिला और जिसको इतना बड़ा खजाना प्राप्त हुआ हो तो व्यक्ति धन्य ही हुआ ना दीदी!”

विपदा के समय धैर्य धारण करते हुए मुकाबला करना तपस्या ही तो है! और गौरव भाई पुनः अपनी तपस्या में लीन हो गए.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “तपस्या

  1. यह भी एक तपस्या है-
    नए-नए आविष्कार हो रहे हैं-
    थाईलैंड: लिफ्ट का ये नया डिजाइन लोगों को कोरोना से बचा पाएगा. हटा दिए लिफ्ट से बटन, लिफ्ट में पैडल्स लगा दिए हैं। मतलब, अब लोगों को हाथ से नहीं, बल्कि पैर से बटन दबाने होंगे।

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