लघुकथा

असली देशभक्त

शराब की दुकान के सामने से शुरू हुई कतार के अंतिम सिरे तक पहुँचने में गुप्ताजी को लगभग एक किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ी । बड़ी शान से वह भी कतार में खड़े हुए । कतार आगे सरक तो नहीं रही थी अलबत्ता अपने पीछे कतार में लंबी भीड़ देखकर उनको थोड़ी खुशी हुई ! तभी एक परिचित अग्रवाल जी अचानक नजदीक आ गए और हैरानी भरे स्वर में बोले ,” अरे गुप्ताजी ! आप ? और शराब की लाइन में ? पहले तो कभी आपको देखा नहीं ? “
” अरे ! तो क्या हम देशभक्त नहीं हैं क्या ?”गुप्ताजी रहस्यमय अंदाज में मुस्कुराए थे ।
पाँच सौ का एक नोट निकालकर अग्रवाल जी ने गुप्ताजी की तरफ बढ़ाया और खीसें निपोरते हुए बोले ,” वो क्या है न गुप्ताजी ! देशभक्त तो हम भी हैं सो 500 रुपये वाली एक देशभक्ति की पर्ची हमारे लिए भी कटवा लीजियेगा ! “

परिचय - राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।

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