सामाजिक

प्रवासी मज़दूर

रोज़ सुबह उठकर कोई अपने निजी काम पर निकलता, कोई खेतों पर, कोई कारखाने, कोई फैक्टरी, कोई ढाबे, कोई होटल, कोई बेलदारी करता, कोई घर बनाता, कोई सड़क, कोई इमारत, कोई फ्लाईओवर इस तरह देश के कोने कोने में न जाने कितने ही मज़दूर अपनी रोज़ी रोटी कमा रहे थे।
कोरोना और लॉक डाउन क्या आया सबसे बड़ी गाज गिरी इन सभी मज़दूरों पर जो घर और काम दोनों से ही हाथ धो बैठे। नतीजन पलायन को मजबूर ताकि अपने गांव, अपने घर, अपने परिजनों के पास पहुंच सकें।
पर ये डगर भी कहाँ इतनी आसान थी कोई साधन नहीं कोई व्यवस्था नहीं तो पैदल ही सड़कें नापते निकल पड़े या जिसका जो भी साधन मिला रिक्शा, टेम्पो, ट्राली, ट्रक बस बेहाल हुए चल पड़े। कुछ की ये आस अधर में ही छूट गयी जब हादसों के शिकार कई मज़दूर जान गंवा बैठे कुछ सड़क हादसों में तो कुछ रेल की पटरी पर।
लाखों की बेबस भीड़ यकायक उमड़ पड़ी तो प्रशासन और राजनीतिक सरगर्मियां भी तेज़ होने लगीं साथ ही आरोप प्रतिरोपण का दौर। जिस के चलते बसें और रेलगाड़ीयाँ चलाने का निर्णय हुआ जिस से इन मज़दूरों को उनकी मंजिल तक पहुंचाया जा सके। पर ये डगर भी संकरी निकली लोग ज़्यादा साधन कम, बदहवासी, बदहाली का मंजर लाखों लोग बेबस लंबी लंबी कतारों में सिर्फ इंतज़ार को मजबूर।
रही सही कसर गर्मी के तापमान ने कर दी आग बरसाते आसमान के नीचे भूखे, प्यासे ,लाचार मज़दूर और दम तोड़ती उनकी उम्मीदें , सब्र और आस। कहीं झुझती गर्भवती महिला, कहीं गोद में बच्चे, कहीं वृद्ध।तरह चाहे आदमी, औरत, बच्चे, युवा या वृद्ग सभी बस लाचार से। जो हाथ कभी मेहनत करते थे आज लाचार दो बूंद पानी को भी तरसते हुए। कैसी विडंबना है जब ये अपनी अपनी जगह काम करते थे तब ये उसी जगह, उसी नगर, उसी प्रदेश के कहलाते थे, बस हालात क्या बदले इनका नामकरण “प्रवासी मज़दूर” हो गया जो पलायन को मजबूर हुए।
भले ही सरकारें, सामाजिक संस्थाएं व अन्य लोग कुछ भी कहें करें हकीकत तो यही है न की अपने ही देश में इन लोगों को इस लाचारी का सामना करना पड़ रहा है जिन से उनके काम के साथ उनका अस्तित्व भी छीन गया। फिर भी न तो राजनीतिक आपसी वार थम रहे हैं, न राज्यों की सरकारों के बीच के वार्तालाप, न मौसम की मार, न ही भूख और प्यास की मार….इन सब में बस बेहाल, बेबस, हारा हुआ लाचार गरीब मज़दूर बनाम ” प्रवासी मज़दूर”।
— मीनाक्षी सुकुमारन

परिचय - मीनाक्षी सुकुमारन

नाम : श्रीमती मीनाक्षी सुकुमारन जन्मतिथि : 18 सितंबर पता : डी 214 रेल नगर प्लाट न . 1 सेक्टर 50 नॉएडा ( यू.पी) शिक्षा : एम ए ( अंग्रेज़ी) & एम ए (हिन्दी) मेरे बारे में : मुझे कविता लिखना व् पुराने गीत ,ग़ज़ल सुनना बेहद पसंद है | विभिन्न अख़बारों में व् विशेष रूप से राष्टीय सहारा ,sunday मेल में निरंतर लेख, साक्षात्कार आदि समय समय पर प्रकशित होते रहे हैं और आकाशवाणी (युववाणी ) पर भी सक्रिय रूप से अनेक कार्यक्रम प्रस्तुत करते रहे हैं | हाल ही में प्रकाशित काव्य संग्रहों .....”अपने - अपने सपने , “अपना – अपना आसमान “ “अपनी –अपनी धरती “ व् “ निर्झरिका “ में कवितायेँ प्रकाशित | अखण्ड भारत पत्रिका : रानी लक्ष्मीबाई विशेषांक में भी कविता प्रकाशित

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