कविता

आज़ का मजबूर मजदूर



खाने को अन्न नहीं! मजदूर क्या करें,
पीने को पानी नहीं! मजदूर क्या करें,
पहनने को कपड़े नहीं! मजदूर क्या करें,
आज का मजबूर मजदूर बताओ क्या करें?

रहने को घर नहीं! मजदूर क्या करें,
काम करने को काम नहीं! मजदूर क्या करें,
बच्चों को रोता-बिलखता देख! मज़दूर क्या करें,
आज़ का मजबूर मजदूर बताओ क्या करें?

जेब बिल्कुल ख़ाली! मज़दूर क्या करें,
तपती गर्मी में धूप में खड़ा! मजदूर क्या करें,
भगवान भरोसे बैठा! मज़दूर क्या करें,
आज़ का मजदूर बताओ क्या करें?

दूसरों के दिए टुकड़े पर पले! मज़दूर क्या करें,
अपना वजूद खोकर! मज़दूर क्या करें,
खुद्दार मज़दूर! अपने दिल की आवाज़ सुनकर,
अपने घर वापस लौट चले! आज़ का मजदूर पलायन करे।

मौलिक रचना
नूतन गर्ग (दिल्ली)



परिचय - नूतन गर्ग

दिल्ली निवासी एक मध्यम वर्गीय परिवार से। शिक्षा एम ०ए ,बी०एड०: प्रथम श्रेणी में, लेखन का शौक

One thought on “आज़ का मजबूर मजदूर

  1. आज़ जब मजदूरों को पलायन करते देखती हूं तो बस भगवान से यही प्रार्थना करती हूं कि ये सब ठीक-ठाक अपने घर पहुंच जाएं। आप सबसे भी मेरी यही विनती है कि आप सब भी इनके लिए और अपने भारत के लिए प्रार्थना ज़रूर करें।

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