हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – मौसम शुरू हो गया है

सबका अपना एक मौसम होता है। बिना मौसम के कुछ भी अच्छा नहीं लगता।आज पर्यावरण दिवस से पर्यावरण मित्रों का भी मौसम शुरू हो गया है। बाकायदा हवन में खुशबूदार समिधा की गिनी हुई आहुतियाँ देने के बाद श्रीगणेश हो गया। वैसे साल भर गाहे -ब -गाहे कार्यक्रम चलते रहते हैं। लेकिन जैसे ही पाँच जून का आगमन होता है , पूरे जोश -ओ-खरोश के साथ इस मौसम का उद्घाटन हो जाता है। सबसे पहले कवि , शायर, बुद्धिजीवी और विचारकों के माध्यम से पर्यावरण पर कविताएं, शायरी और बड़े -बड़े लेख प्रकाशित किए जाते हैं।स्वयं को छोड़कर दूसरों को पेड़ लगाने के लिए प्रेरित किया जाता है कि वे अधिक से अधिक पौधरोपण करें , ताकि वर्षा अधिक हो। धरती की प्यास बुझे।ज्यादा अन्न , फल , सब्जी , दुग्ध का उत्पादन हो। क्या अखबार , क्या टी वी , क्या सोशल मीडिया सब पर मानो बाढ़ ही आ जाती है।सोए हुए भी खड़े हो जाते हैं। जिनकी अस्थियाँ जकड़ गई हैं , उनमें भी नए नए कल्ले प्रस्फुटित होने लगते हैं।
फिर क्या ! कार्यक्रमों पर कार्यक्रम चलने लगते हैं।गड्ढे खोदने वाले गड्ढे खोदते हैं। पौध लाने वाले पौधे लाते हैं ,और माननीय महोदय अपने सफेद चमचमाते सूट में एक पौधा ऐसे पकड़ते हैं कि हाथ से मिट्टी न छू जाए। वे झुक कर उस पौधे को उठाने का कष्ट भी नहीं करते , क्योंकि उनकी कमर को बल खाने का खतरा है। जिसे वे किसी भी कीमत पर नहीं उठाना चाहते। इसलिए पहले से ही तैनात एक स्फूर्तिवान युवक चटपट उनके कर कमलों में पॉलीथिन आवृत पौधे को थमा देता है। उन्हें तो इसकी पॉलीथिन को हटाने का कष्ट गवारा नहीं होता , इसलिए इशारा होता है कि इसकी पोलिथिन हटाई जाये। तुरंत पॉलीथिन हटाई जाती है। इसके बाद मोबाइलों औऱ कैमरों, की फ्लैश पर फ्लैश चमकने लगती हैं। मननीय मुस्कराते हुए फ़ोटो खिंचवाते हैं। पौधा तो एक ही लगता है , पर पोज बदल बदल कर अनगिनत फोटो की एलबम तैयार हो जाती है।तब कहीं जाकर एक पौधा लगाने के लिए वे गड्ढे की ओर झुकते हैं। यद्यपि झुकना तो उन्होंने कभी सीखा ही नहीं , लेकिन यहाँ उन्हें विवश होकर झुकना ही पड़ता है। देते समय देने वाले का झुकना प्राकृतिक ही है। जब तक आप किसी को कुछ देते हैं , तो झुकना ही पड़ेगा। एक नन्हा सा पौधा माननीय को आखिर झुका ही लेता है। तने हुए खड़े रहने पर आप किसी को कुछ दे नहीं सकते और लेने वाला ले नहीं सकता , क्योंकि लेने की प्रक्रिया में झुकना एक अनिवार्य कृत्य है। लेने वाले के हाथ सदैव नीचे ही रहते हैं।यहाँ पर जो देने वाला दिखता है ,वह माँगने वाला है। उसे यश चाहिए एक पौधा लगाकर, खुशी चाहिए एक पौधा लगाकर, सराहना चाहिए एक नवांकुर सजाकर।
सबको देने वाली धरती को कोई क्या देगा ? वह तो जननी है। जीवन , अन्न , जल , फल , दुग्ध ,ईंधन, वसन , घर , सोना , चांदी , धन धान्य सब कुछ वही तो देती है।और मूढ़ समझता है कि वह एक पेड़ रोपकर धरती को दे रहा है। भिखारी अपने को दाता मान बैठा है।
तो माननीय जी पौधा लगा रहे थे। उन्होंने पौधे को पूर्वनिर्मित गड्ढे में रख दिया है। पुनः फ़ोटोबाजी और विडिओबाजी की होड़ लग गई है। वे कैमरे की ओर मुँह उठाये हुए दंत दर्शन कराते हुए से फ़ोटो खिंचवा रहे हैं। पौधे के तने को हाथ से स्पर्श किया हुआ है। बस इतने जागरूक अवश्य हैं कि कहीं हाथों से मिट्टी न छू जाए! फ़ोटो बराबर खिंच रहे हैं। और चेला गण गड्ढे में मिट्टी डाल रहे हैं। माननीय कमर पर हाथ टेककर उठ कर खड़े हो रहे हैं। पौधारोपण का कार्य 90 प्रतिशत पूरा हो चुका है। उधर देखें वह एक चेला बाल्टी में पानी लेकर हाथ में मग थामे हुए तेज कदमों से चला आ रहा है। यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि इसका क्या होना है। इतना तो तय है कि पहले माननीय के हाथ धुलवाए जाएँगे। उन्हें नहलाया नहीं जाएगा । यदि बच गया तो पौधे के हवाले कर दिया जाएगा।लो जी , हो गया पौधारोपण: एक राष्ट्रीय कार्यक्रम।
अगले दिन अखबार में मुस्कराते हुए माननीय के साथ एक लंबा चौड़ा समाचार छापा गया कि उनके द्वारा 501 पौधे लगाए गए। साथ में किसी बुद्धिजीवी द्वारा लिखा गया भाषण भी सुर्खियां बटोर रहा था। यदि देश में सभी माननीयों के द्वारा पौधे लगाने की यही गति रही तो वह दिन दूर नहीं जब देश का हर गाँव , खेत , शहर , ऊसर ,बंजर , वन ,उपवन सब जगह पेड़ों के झुरमुट होंगे। हरित क्रांति ही हो जाएगी।सारा प्रदूषण दूर होगा। नदियाँ कलकल निनाद से सागर की ओर अवगाहन करेंगीं। खूब वर्षा होगी। आँकड़े सच साबित होंगे। फिर ऊपर से नीचे तक सबके आंकड़ों में कोई भेद नहीं होगा। जो ऊपर वाला कहेगा , उसे ही नीचे वाला भी दुहरायेगा।सर्वत्र समानता का बोलबाला होगा। एक सच्ची हरित क्रांति होगी।हरित का अर्थ चोरी की हुई नहीं , हरी हरी क्रांति ।
देश के कर्णधारों के कर कमलों से कृत पर्यावरण मित्र बनाने औऱ उसे अंगीकृत कराने करने का काम एक अनिवार्य महत्वाकांक्षी आयोजन है। जो जेठ /जून की पाँच तारीख से आगाज करते हुए शरद के शुभारंभ तक चलता है।यह माननीयों का वसंत है। वे संत और इधर ये वसंत। वैसे होता है यह अनन्त। परन्तु इसका भी है कुछ किन्तु परंतु। पावस की बहार।धरती को उपहार।

—  डॉ. भगवत स्वरूप ‘शुभम’ 

परिचय - डॉ भगवत स्वरुप

पिता: श्री मोहर सिंह माँ: श्रीमती द्रोपदी देवी जन्मतिथि: 14 जुलाई 1952 कर्तित्व: श्रीलोकचरित मानस (व्यंग्य काव्य), बोलते आंसू (खंड काव्य), स्वाभायिनी (गजल संग्रह), नागार्जुन के उपन्यासों में आंचलिक तत्व (शोध संग्रह), ताजमहल (खंड काव्य), गजल (मनोवैज्ञानिक उपन्यास), सारी तो सारी गई (हास्य व्यंग्य काव्य), रसराज (गजल संग्रह), फिर बहे आंसू (खंड काव्य), तपस्वी बुद्ध (महाकाव्य) सम्मान/पुरुस्कार व अलंकरण: 'कादम्बिनी' में आयोजित समस्या-पूर्ति प्रतियोगिता में प्रथम पुरुस्कार (1999), सहस्राब्दी विश्व हिंदी सम्मलेन, नयी दिल्ली में 'राष्ट्रीय हिंदी सेवी सहस्राब्दी साम्मन' से अलंकृत (14 - 23 सितंबर 2000) , जैमिनी अकादमी पानीपत (हरियाणा) द्वारा पद्मश्री 'डॉ लक्ष्मीनारायण दुबे स्मृति साम्मन' से विभूषित (04 सितम्बर 2001) , यूनाइटेड राइटर्स एसोसिएशन, चेन्नई द्वारा ' यू. डब्ल्यू ए लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड' से सम्मानित (2003) जीवनी- प्रकाशन: कवि, लेखक तथा शिक्षाविद के रूप में देश-विदेश की डायरेक्ट्रीज में जीवनी प्रकाशित : - 1.2.Asia Pacific –Who’s Who (3,4), 3.4. Asian /American Who’s Who(Vol.2,3), 5.Biography Today (Vol.2), 6. Eminent Personalities of India, 7. Contemporary Who’s Who: 2002/2003. Published by The American Biographical Research Institute 5126, Bur Oak Circle, Raleigh North Carolina, U.S.A., 8. Reference India (Vol.1) , 9. Indo Asian Who’s Who(Vol.2), 10. Reference Asia (Vol.1), 11. Biography International (Vol.6). फैलोशिप: 1. Fellow of United Writers Association of India, Chennai ( FUWAI) 2. Fellow of International Biographical Research Foundation, Nagpur (FIBR) सम्प्रति: प्राचार्य (से. नि.), राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सिरसागंज (फ़िरोज़ाबाद). कवि, कथाकार, लेखक व विचारक मोबाइल: 9568481040

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