शिशुगीत

छोले

ममी कहतीं, ‘खा लो सब्जी’,
मैं कहता हूं, ‘दे दो छोले’,
छोले-पूरी, कुल्चे-छोले,रेस्टोरेंट-ढाबे वाले ऐसे बनाते हैं ...
छोले-भटूरे, चावल-छोले.
सूखे छोले, खट्टे छोले,
या रसदार बने हों छोले,
चाहे सब्जी लाख बनी हों,
छोले तो रहते हैं छोले.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

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