कविता

बरखा बहार

आई है बरखा बहार
लाई  बूदों की फूहार
काली घटा उमर उमर
खूब बरसे नगर नगर।
काली- काली है बदली
कड़क-कड़क गरजती
धनघोर होके ये दखो
कितनी जोर है बरसती।
लबा लब हुए नदी नाले
फैले चहुँ ओर हरियाली
श्रृंगार कर धरती देखो
चका-चक  है चमकती ।
मेधो की गर्जना और
मेढक   की   टर्र-टर्र
घूप  होते बादलो पर
संगीत सी  है लगती।
ऐ मौसम तेरा शुक्रिया
जिसने यह बर्षा बनाया
धरती पर सभी जीवोका
मुख्य आधार बनाया।
बारिस  की बूँदो में
गजब की शक्ति है
धरती पर जीवन की
यही सच्ची भक्ति है।
— आशुतोष 

आशुतोष झा

पटना बिहार M- 9852842667 (wtsap)