लघुकथा

सहारा

जीवन की सांध्य-वेला भी थी और दिन की भी. बिना पलक झपकाए अनिमेष जी लाठी पकड़े चले जा रहे थे. यों तो वे दिखने में अकेले ही थे, पर हमेशा की तरह उनके संग यादों का मेला भी था.

”ध्यान रहे शिखर पर इंसान हमेशा अकेला होता है.” अनिमेष जी ने कहीं पढ़ा भी था और झेला भी था.

”स्वास्थ्य मंत्रालय में डिप्टी सेक्रेटरी के शानदार पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने अपने लेखन के हुनर को कैसे चमकाया!” याद करके अनिमेष जी की आंखें चमक उठीं.

”शर्मा जी, आप तो बहुत अच्छे गीत-ग़ज़लकार हैं. मीर तकी मीर पर कोई पुस्तक लिखिए. हमारी पुरस्कार प्रतियोगिता चल रही है.” हिंदी निदेशालय से निदेशक वीरेंद्र श्रीवास्तव का फोन आया था.

”मीर तकी मीर” की शायरी की समीक्षा पर उनकी दो पुस्तकें आईं और दोनों को ”हिंदी निदेशालय पुरस्कार” से सम्मानित किया गया.” अनिमेष जी के सामने पुरस्कार समारोह जीवंत हो उठा था.

”इसका श्रेय उनकी पत्नी को भी जाता था. रोज जितना लिखते, वे पढ़तीं और उस पर लम्बी समीक्षा चलती. सब काम से निवृत होकर रतनलाल भी वहीं आकर चुपचाप बैठ जाता और शायरी का रसपान करते-करते खुद भी शायर हो गया था.” रतनलाल की तस्वीर उनकी आंखों के समक्ष नाच उठी थी.

”सम्मान समारोह के बाद जाने क्यों वे अकेले पड़ गए. शायद उनकी कामयाबी को अन्य प्रतिभागी पचा नहीं पाए थे. अब तो पत्नी का साथ भी छूट गया था, पर बचपन से ही उनके पास रहकर पले रतनलाल ने उन्हें कभी अकेला नहीं महसूस होने दिया.” मन-ही-मन अनिमेष जी रतनलाल की इस विशेषता को सराहते रहे.

”आपकी गुमसुमी मुझसे नहीं सही जाती, बाबूजी.” चाय पकड़ाते हुए रतनलाल ने कहा था. फिर शुरु हो गई थी शेरो-शायरी की महफिल.

”रतनलाल, अब तो तुम भी एक पुस्तक लिख ही डालो. अपने हस्तलिखित कागज मुझे दे दो, बाकी काम मैं कर दूंगा.” यादों के मेले का एक और दृश्य उनके स्मृतिपटल पर उभर आया था.

”इसी काम ने मुझे इतना व्यस्त कर दिया था, कि मेरी गुमसुमी कहां चली गई थी, मुझे नहीं पता!” अनिमेष जी अवाक थे.

”मेरा काम तब रुका था, जब रतनलाल को ”साहित्य अकादमी” के सम्मान से सम्मानित किया गया था!” अनिमेष जी रतनलाल को ढूंढ रहे थे.

”अब कहां मिलेगा रतनलाल! दस दिन पहले उसने इस दुनिया से ही अलविदा ले ली थी.” अनिमेष जी शून्य में ताक रहे थे.

”एक-एक करके सारे सहारे छूट गए. अनिमेष जी की उदासी मुखर हो, उससे पहले एक आवाज सुनाई दी.

”मैं हूं न तेरा सबल सहारा! जन्म से मरण तक मैं तुम्हारे साथ रहती हूं.” पास के पेड़ की लकड़ी ने कहा. ”इस समय भी लाठी के रूप में तुम्हारे साथ हूं.”

डूबते को तिनके का सहारा मिल गया था.

चलते-चलते
“सदाबहार काव्यालय- 3” के लिए आह्वान-
अभी 4 दिन पहले ब्लॉग ”यादों के झरोखे से- 22” में हमने गौरव भाई के सस्नेह आग्रह पर “सदाबहार काव्यालय- 3” का आह्वान किया था. अभी हमारे पास ”ई.बुक सदाबहार काव्यालय- 2 ” पूरी प्रतिक्रियाएं भी नहीं आई हैं, लेकिन आपको यह जानकर अत्यंत हर्ष होगा, कि हमारे पास पहली कविता पहुंच चुकी है. लेखक ने भलीभांति सुर-लय-ताल मिलाकर कविता भेज दी है. पूरी प्रतिक्रियाएं आने के बाद अग्रलेख आएगा, उसके बाद ही श्रंखला शुरु हो सकेगी. अभी कुछ समय लगेगा. आप लोग काव्य-रचनाएं (कविता-गीत-गज़ल-बाल गीत आदि) लिखकर तैयार रखिए.  सहयोग के लिए हृदय से शुक्रिया और धन्यवाद.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “सहारा

  1. जैसी संगति बैठिए, वैसो ही फल देय. प्रतिभा ने प्रतिभा को उद्भासित कर दिया था.

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