शिशुगीत

कबूतर

मेरी ममी मुझे पढ़ातीं,कबूतर में लगी थी इलेक्ट्रॉनिक चिप ...
‘क’ कबूतर कहना सिखातीं,
मैं कहता तब ”कहां कबूतर?”,
”वह तो है घोंसले के अंदर.
गुटरूं-गूं-गूं करता है,
प्यारा-प्यारा होता है,
खूब काम का पक्षी है यह,
कुशल डाकिया होता है.”

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

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