लघुकथा

जड़ें

”यदि सपने सच नहीं हों, तो रास्ते बदलो सिद्धांत नहीं,
क्योंकि पेड़ हमेशा पत्तियां बदलते हैं, जड़ें नहीं.”

सुशीला मिस्त्री ने भी देश बदला है, जड़ें नहीं.

”कहीं भी जाओ, अपनी जड़ें कभी मत बदलना.” सिडनी आते हुए बचपन में बड़े-बुजुर्गों द्वारा कही गई यह बात 90 वर्ष की सुशीला को अभी भी याद है.

”यह कैसे होगा?” सुशीला ने मां से पूछा था.

”होगा क्यों नहीं? जहां रहो, वहां की सभ्यता-संस्कृति से अवगत रहना, उसको भी अपनाना, सबसे मेल-मिलाप रखना, साथ में ममी-डैडी कहना-सुनना छोड़कर बच्चों को काका-काकी, अम्मा-बाबा कहना सिखाना, ढोकला-खाखड़ा-फाफड़ा को भुलाना नहीं.”

”इतने से ही हो जाएगा!” सुशीला की जिज्ञासा थी.

”और क्या?” जवाब मिला था, ”बच्चे पूछेंगे, यह क्या है, बस यही कहना- यह भारतीय सभ्यता-संस्कृति है, गुजराती समाज का चलन है. भारतीय सभ्यता-संस्कृति भी जिंदा रहेगी और गुजराती समाज की जड़ें पुख्ता.”

”ढोकला-खाखड़ा-फाफड़ा बनाकर बेचते-कमाते मुझे अरसा हो गया.” सुशीला का कहना है.

रोज फ्री कर्टसी बस में कैसीनो आकर भी सुशीला ने अपनी सभ्यता-संस्कृति की जड़ें पुख्र्ता रखने में कोई कोर-कसर नहीं रहने दी है.

अब उसकी बहू-बेटियां ढोकला-खाखड़ा-फाफड़ा बनाकर विदेश में रहकर भी भारतीय सभ्यता-संस्कृति की जड़ें पुख्र्ता कर रही हैं.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “जड़ें

  1. आज भी सुशीला और उसकी बहू-बेटियां ढोकला-खाखड़ा-फाफड़ा बनाकर विदेश में खूब धन भी कमा रही हैं, साथ ही भारतीय सभ्यता-संस्कृति की और गुजराती समाज की जड़ें पुख्ता कर रही हैं.

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