कविता

🌳🌳🌱पर्यावरण 🌱🌳🌳

ये प्रकृति कुछ कहती है
खुद को ढूबने लगी हूँ मैं
हर वक्त चल रही थी, हर वक्त सम्भल रही थी, ,
कुछ इस कदर बोझ तले दब गयी थी, मैं
कुदरत की वो पहेली हूँ मैं, इन्सान के हाथों की
कठपुतली बन गयी थी मैं, ।
खुद को ढूंढते हुए निकल पड़ी हूँ मैं, जरूरतें सबकी थी मुझसे
पर वास्ता बहुत कम हो गया था मुझसे,
मैं बार-बार आह्वान करती रही, न जलाओ न तोडो न मरोडो मुझे
मैं स्वतंत्र हूँ न कैद करो मुझे मै प्रकृति हूँ
मैं पर्यावरण हूँ, मै खुले आसमां की संगनी हूँ

मैं तीज त्यौहारों की, फल फूलों की
महक हूँ , महसूस करो मुझे, मैं भी तुम से मिलने की
हर कोशिश में लगी हूँ,
सुधार लो भूल अपनी, मै अपना आँचल लिए खड़ी हूँ,
जी लेने दो मेरे ह्रदय के नन्हे जीवों को साथ में
तुम भी जी लो इक मुस्कान लिए,
खड़ी हूँ बांह फैलाए फिर से आ जाओ मेरे आँचल की छाँव तले
तुम्हारे बिना कुछ अधूरी सी हूँ, ढूंढने निकली हूँ खुद को मैं,
परिन्दों से लेकर हर वन्यजीव की सुरक्षा कवच हूँ मैं,
न मारों मेरे इन बेजुबां, बच्चों को ये मेरी मुस्कराती हुई सुबह हैं
ये मेरी अलसाई शाम की आवाज़ हैं ये, इन आँखों में वो सब मंज़र हैं ।
जो प्रेम और स्नेह की लकीरें हैं । तुम्हारे लिए ये बेजुबां जानवर हैं ।
पर मेरे लिए पर्यावरण और प्रकृति की शान हैं ये, ।
हे इन्सान तुम मेरी जुबां हो और ये मेरी, बगिया के सितारे हैं
हर सुबह इनके साथ खिलती है, , हर शाम इनके साथ ढलती है।
प्रकृति कहती है मैं वो समां हूँ, तुम्हारे घर आँगन की बगिया हूँ,
खुद को ढूंढने लगी हूँ मैं, तुम्हें कुछ बताने निकली हूँ मैं,
रूक जाओ ठहर जाओ, एक नयी रोशनी, नयी उमंगे लिए खड़ी हूँ मैं,
तुम्हारे चेहरे की मुस्कान के लिए तरस गयी हूँ में भी,
इक नयी पहल लिए बांह फैलाए खड़ी हूँ मैं,
आ जाओ सब मिलकर एक नया इतिहास रचें
सब प्राणियों का सम्मान करें, अपनी इस प्रकृति के साथ चलें,
ये प्रकृति कुछ कहती है, आओ हम सब मिलकर आगे बढ़े,
बस इतना ही कहने निकली हूँ मैं, ।।

परिचय - सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ

स्नातकोत्तर (हिन्दी)

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