हास्य व्यंग्य

घोटाले का समाजशास्त्र

अपने देश में जब से घोटालों का धारावाहिक आरंभ हुआ है तब से रिश्वतजीवियों की बची – खुची अपराध भावना भी जाती रही है I कल की ही बात है , गुप्ता जी मिल गए I वे हमारे पुराने परिचित हैं , एक सरकारी विभाग में क्लर्क है I रिश्वत के बिना किसी फाइल को हाथ लगाना वे अपने सिद्धांतों के विरुद्ध मानते हैं I उन्होंने फलां – फलां की नामावली को सगर्व प्रस्तुत करते हुए कहा कि मुल्क के तारनहार ही करोड़ों – अरबों को उदरस्थ कर रहे हैं , मैं तो निरा एक क्लर्क हूं I मेरी रिश्वत राशि की सीमा तीन अंको तक ही सीमित है I पहले वे दो अंको तक ही अपनी औकात समझते थे लेकिन आर्थिक उदारीकरण के बाद उनके रिश्वत में एक अंक का इजाफा हुआ है I अब उन्हें कौन समझाए कि तुम किसी उदारता के कारण तीन अंको तक सीमित नहीं हो बल्कि यह तो पावर और चांस की बात है ,जैसा पावर वैसा घोटाला , जैसा चांस वैसा गड़बड़झाला I तुम निरे क्लर्क हो और क्लर्क तीन अंकों की लक्ष्मण रेखा को पार करने की हैसियत नहीं रखता I उन्हें समझाना भी मुश्किल है कि वे जिन महारथियों का नाम उल्लेख कर रहे हैं उन महारथियों ने जिंदगी में कितनी मेहनत – मशक्कत की है , सड़कों और राजनीति के गलियारों में अपनी भरी जवानी के कितने वर्ष धूप –वर्षा- शीत को सहन करते हुए गुजारे हैं और जनता के दरबार में कितने ठोकर खाए हैं तब जाकर वे इस हिमालयी ऊंचाई तक पहुंचे हैं I घोटाला शब्द का संबंध घोंटने से है – बिना चबाए निगल जाना और डकार तक नहीं लेना, चट कर जाना I घपला, गड़बड़ी, अव्यवस्था इत्यादि इसके समानार्थी शब्द हैं पर घोटाला में जो ब्रह्मानंद सहोदर भाव है वह अन्य पर्यायों में कहाँ ? यदि मुझमें प्रतिभा होती तो मैं इन घोटाला पंडितों की चरितावली का सृजन करता I नाम रखता –घोंटू चरितमानस या घपलेबाजों के अद्भुत कारनामे अथवा घोटालाबाज चरितावली I मैं इस बात की कोई चिंता नहीं करता कि आलोचक बंधु मुझे चारण घोषित करेंगे अथवा चाटुकार बुद्धिजीवी, लेकिन अफसोस कि आजकल प्रतिभाएं तो इन महापुरुषों के घरों में ही जन्म लेती हैं और राष्ट्रीयता के धर्म में दीक्षित इन प्रतिभाओं को देश सेवा से फुर्सत ही कहां मिलती है कि वे कागज काला करने जैसे निरर्थक एवं अनुत्पादक कार्यों में देश का एवं अपना बहुमूल्य समय तथा उर्जा नष्ट करेंगेI भविष्य में मेरी योजना घोटाले की उदात्त परंपरा और सामाजिक जीवन पर उसका क्रांतिकारी प्रभाव विषय पर पीएचडी करने की है I इसकी रूपरेखा भी मैंने तैयार कर ली है I इसमें प्राचीन काल से लेकर अब तक के उल्लेखनीय घोटालों का सविस्तार – ससंदर्भ वर्णन होगा, घोटाले की गरिमामंडित पृष्ठभूमि वाले मनीषियों की सचित्र जीवनी होगी I मैंने उनके लिए एक प्रश्नावली तैयार की है I इसमें मुख्य – मुख्य प्रश्न है – आपको घोटाले की प्रेरणा कहां से मिली, घोटाले का सामाजिक दर्शन क्या है ,इस युगांतरकारी सफलता में आपकी बीवी और सगे-संबंधियों का कितना हाथ है, आप घोटाला साहित्य की रचना करने के लिए कुछ सोच – विचार कर रहे हैं, इस रचनात्मक सफलता के लिए यदि आपको नोबेल पुरस्कार जैसा कोई पुरस्कार दिया जाए तो आपको कैसा लगेगा, आप उस पुरस्कार राशि को स्वीकार करेंगे अथवा किसी ट्रस्ट को दान कर देंगे आदि – आदि I अब मुझे तलाश है एक सुयोग्य निदेशक की जो मुझसे बिना कुछ फूल – अक्षत – चंदन ग्रहण किए शोध ग्रंथ को पूर्ण कराने के लिए तैयार हो जाए लेकिन मेरी बदकिस्मती है कि अभी तक मुझे ऐसा कोई गुरु नहीं मिला है क्योंकि मैं समाज का सबसे लाचार प्राणी अदना – सा मास्टर हूं I अब आपसे क्या छुपाना , आप तो जानते ही हैं I मास्टरों की कंगाली और फटेहाली को I आपके आस – पास भी अनेक मास्टर होंगे – पैबंद लगे कुर्ते, टूटी साइकल और फटी जेब इस वर्ग की पहचान है I अपने महान मुल्क के सभी लोग मास्टर वर्ग से आशा करते हैं कि वह समाज के लिए आदर्श प्रतीक बना रहे और शेष लोग पूरे मनोयोग से स्वतंत्रता पूर्वक राष्ट्रीय संपत्ति को अपने बाप का माल समझ कर दोहन – घोंटन – शोषण – निचोरन करते रहें I सभी आशा करते हैं कि हम बच्चों को नैतिकता का गलत पाठ पढ़ाते हुए ईमान और आदर्श का झंडा लेकर पतनशील समाज के लिए प्रकाश स्तंभ बने रहें I मैं मास्टर हूं, इसलिए कंगाल हूँ, उधारजीवी हूँ, पांव को जितना समेट- सिकोड़ लूं, हर बार चादर छोटी हो जाती है I मेरी कंगाली के कारण ही अभी तक कोई शोध गुरु नहीं मिला है जो बिना पुजापा लिए शोधप्रबंध को पूर्ण कराने में अपनी राष्ट्रीय भूमिका का निर्वाह कर सकें I इसलिए मैं “तलाश है एक सुंदर, सुशील, सजातीय कन्या की” के वैवाहिक विज्ञापनों की तरह एक विज्ञापन देने जा रहा हूं – तलाश है एक पूज्य, विद्वान और राष्ट्रवादी शोध निदेशक की जो बिना दक्षिणा लिए मुझे पीएचडी करा दे I
यदि मैं इतिहासकार होता तो राष्ट्रवादी विचारों में आपादमस्तक डूबे घोंटू पंडितों को इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ में अंकित कर उन्हें अमर कर देता I अब यह अलग बात है कि मास्टर के पास कागज खरीदने को पैसे नहीं होते, सोने के पृष्ठ कहां से खरीदेगा, लेकिन दुर्भाग्य है कि इतिहासकार नहीं हूं और यदि बनने की कोशिश भी करूँ तो इतिहास के क्षेत्र में पालथी लगाकर बैठे हुए इतिहासकार बंधु मुझे इतिहास लेखक बनने नहीं देंगे I कहेंगे, मास्टर बेचारा क्या खाकर इतिहास लिखेगा I इतिहास की एकपक्षीय व्याख्या करने वाले इतिहासकार तो अपनी-अपनी खोली में निर्दय सेठ की भांति बैठकर ऐतिहासिक चरित्रों के साथ खेल रहे हैं I वह जिसे चाहे सांप्रदायिक और जिसे चाहे धर्मनिरपेक्ष साबित कर देते हैं I यों घोटाले तो पहले भी होते थे लेकिन तब उदारीकरण का युग नहीं आया था I जबसे उदारीकरण का युग आया है, प्रशासन पारदर्शी हो गया है I अब यह अलग बात है कि यह पारदर्शिता किसी विवशता की उपज है I भिन्न –भिन्न पेशों से जुड़े हुए लोग अपनी सुविधा और लाभ के अनुसार उदारवाद को ग्रहण कर पल्लवित-पुष्पित हो रहे हैं I घोटाला विरोधी आलोचकों को कौन समझाए कि इन घोटालों से हमारा साहित्य और समाजशास्त्र कितना समृद्ध हुआ है I साहित्य को घोटाला रस के रूप में दसवें रस की प्राप्ति हुई है और समाजशास्त्र को प्रतिभूति, चारा, हवाला, टू –जी इत्यादि नए -नए शब्द प्राप्त हुए हैं I आलोचकगण कहते हैं कि रांची से पटना तक सूअरों , गायों, मुर्गियों की यात्रा स्कूटर से कैसे संभव हुई I इन मूढ़मति निंदकों को वैज्ञानिक उपलब्धियों का अल्प ज्ञान भी नहीं है I जब परखनली से शिशु उत्पन्न हो सकता है, चिकित्सा विज्ञान की सहायता से मर्द को औरत तथा बूढ़े को जवान बनाया जा सकता है तो भला स्कूटर से गाय – भैंस की यात्रा क्यों नहीं हो सकती है I क्या इन जानवरों को जनता का वोट और आशीष लेना है कि उन्हें पदयात्रा का उबाऊ कार्यक्रम बनाना पड़ेगा ! देश के घोटाला मनीषियों को एकजुट होने का समय आ गया है I अब जरुरी हो गया है कि दलित साहित्य की तरह ही घोटाला साहित्य का भी श्रीगणेश कर दिया जाए I इस साहित्य में मीडियापीड़ित, सीबीआई प्रताड़ित और न्यायालय – न्यायाधीशों द्वारा अपमानित विभूतियों के आदर्शवादी विचारों को वाणी दी जाएगी ताकि इनके मानवीय विचारों और रचनात्मक अनुभवों से हमारी भावी पीढ़ी लाभान्वित होकर इस परंपरा को कायम रखे I इस साहित्य में माफियाओं, हवालाबाजों के सामाजिक नव निर्माण संबंधी करतबों को अभिव्यक्त किया जाएगा I प्रेस और कुछ असामाजिक किस्म के आउटडेटेड बुद्धिजीवियों ने घोटाला पुरुषों के साथ बहुत अन्याय किया है और उनके व्यक्तित्व का एकांगी चित्रण किया है I घोटाला साहित्य में इनके साथ न्याय किया जाएगा और उनके महान बहुआयामी व्यक्तित्व को महिमामंडित करने के लिए गरीबी हटाओ की तरह अनंत वर्षीय योजना चलाई जाएगी I हो सकता है कि कुछ आलोचक अपनी राय व्यक्त करें कि जिस प्रकार दलित साहित्य के लिए दलित होना आवश्यक है उसी प्रकार घोटाला साहित्य के रचनाकारों के लिए घोटाला करना जरूरी है I यह बहस का विषय है, इसलिए इस पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित करना समीचीन होगा I
यदि भविष्य में मुझे पावर प्राप्त हुआ और घपला करने का चांस मिला तो मैं किसानों के लिए कागजी यूरिया का आयात करूंगा और अन्न के उत्पादन को हवाई आंकड़ों के लक्ष्य से ऊपर पहुंचा दूंगाI काल्पनिक अलकतरे से सड़कों का मुंह काला कर दूंगा I पशुओं का चारा पशुओं को ही मुबारक हो, मैं तो अपने और अपनी संततियों के लिए मलाई आरक्षित कर दूंगा I मैं न तो बीस सूत्री का विषपान कराऊंगा, न ही पांच सूत्री का पंचक पेश करुंगा I मेरा तो बस एक सूत्री कार्यक्रम होगा जो सभी सूत्रों से धारदार, प्रभावशाली और अचूक होगा – चबाओ नहीं, निगल जाओ I

परिचय - वीरेन्द्र परमार

जन्म स्थान:- ग्राम + पोस्ट- जयमल डुमरी, जिला:- मुजफ्फरपुर(बिहार) -843107, जन्मतिथि:-10 मार्च 1962, शिक्षा:- एम.ए. (हिंदी),बी.एड.,नेट(यूजीसी),पीएच.डी., पूर्वोत्तर भारत के सामाजिक,सांस्कृतिक, भाषिक,साहित्यिक पक्षों,राजभाषा,राष्ट्रभाषा,लोकसाहित्य आदि विषयों पर गंभीर लेखन, प्रकाशित पुस्तकें :-1.अरुणाचल का लोकजीवन(2003) 2. अरुणाचल के आदिवासी और उनका लोकसाहित्य(2009) 3.हिंदी सेवी संस्था कोश(2009) 4.राजभाषा विमर्श(2009) 5. कथाकार आचार्य शिवपूजन सहाय (2010) 6. हिंदी:राजभाषा,जनभाषा,विश्वभाषा (संपादन- 2013) 7.पूर्वोत्तर भारत: अतुल्य भारत (2018) 8.उत्तर - पूर्वी भारत के आदिवासी (2020) मोबाइल- 9868200085, ईमेल:- bkscgwb@gmail.com

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