लघुकथा

राहत

”बड़ा मुश्किल हो गया है इस तरह घुट-घुटकर जीना! आदत जो नहीं रही! घर-ही-घर में बंद! न कहीं आना न जाना! चेहरे पर मुस्कान के बदले मास्क! लिफ्ट में मिलो तो मुंह फेरकर खड़े हो जाओ! यह भी कोई जीना हुआ!” कोरोना और लॉकडाउन से व्यथित अंकित अपने आप से बात कर रहा था.

”मन के द्वार भी हमेशा खुले रहते थे, घर के भी. कोई आता तो ”अतिथि देवो भवः” मानकर चेहरे पे मुस्कान खिल जाती थी. आगंतुक का मन भी प्रफुल्लित हो जाता था—–. आज दिल के दरवाजे भिड़े, घर के कपाट बंद, अतिथि को देखते ही मुख पर करुण मौन का मास्क!” अंकित की सोच जारी थी.

”याद आता है बचपन का वह जमाना, जब घर में खूब चहल-पहल होती थी, धमा-चौकड़ी मची रहती थी. माता-पिता के साथ भाई-बहिनों का जमघट, दादी-दादा, चाची-चाचा की स्नेहिल-सीखमई टोकाटोकी, कोई रोष नहीं, पल में कुट्टी-अनबोला-रूठना, पल में बट्टी-बोलना-मनाना——. आज एकल परिवार और सब अपने मोबाइल में गुम! एक या दो बच्चे कभी-कभी तो कैरियर के चक्कर में वह भी नहीं या फिर शादी के कई सालों बाद, जब जवानी भी ढल जाए और ताकत भी!” उसका मन-मंथन चल रहा था.

”पायदान पर पैर झाड़कर अंदर आया करो.” दादा जी कहते, तो झट से बाहर ड्योढ़ी पर पड़े पायदान पर पैर झाड़कर अंदर आते थे. बड़ों की बातें मानने में कैसी शर्म!

”हमेशा खुश रहा करो. मुंडेर से मधुमालती लिपटी हुई है, नाराजगी वहीं उंड़ेलकर आया करो.” दादी कहतीं. सब ऐसा ही करते. कोई अहम नहीं.

”ये त्यौरियां क्यों चढ़ी हुई रहती हैं? तुलसी के क्यारे में मन की चटकन चढ़ा आया करो.” चाची कहतीं. सब ऐसा ही करते थे. न मानने का प्रश्न ही नहीं था.

”अपनी व्यस्तताएं, बाहर खूंटी पर ही टांग आना..!” चाचा जी का कहना सत्य ही तो था. भला घर के अंदरमन की अपनी व्यस्तताओं का क्या काम!

”जूतों संग, हर नकारात्मकता बाहर उतार आना..!” बुआ जी कहतीं. सबको अच्छा-सा लगता. नकारात्मकता नाकारा जो बना देती है!

”बाहर किलोलते बच्चों से थोड़ी शरारत मांग लाना..!” कितना अच्छा लगता था अम्मा का यह कहना! शरारती व्यक्ति बुजुर्ग भले ही हो जाए, बूढ़ा कभी नहीं होता.

”लाओ, अपनी उलझनें मुझे थमा दो. तुम्हारी थकान पर, मनुहारों का पँखा झुला दूँ..!” शाम को थके-हारे बाबूजी के घर आने पर अम्मा उनसे छाता लेते हुए कहतीं. उनके साथ सबकी थकान दूर हो जाती.

”देखो, शाम बिछाई है मैंने, सूरज क्षितिज पर बांधा है, लाली छिड़की है नभ पर..! प्रेम और विश्वास की मद्धम आंच पर, चाय चढ़ाई है, घूंट-घूंट पीना..!” जिंदगी कहती थी.

”सुनो, इतना मुश्किल भी नहीं हैं जीना..!!” सबको लगता था.

आज फिर वैसा ही सब कुछ हो रहा है, पर भारतीय सभ्यता-संकृति के सम्मान के कारण नहीं, चीन के कोरोना के डर के कारण. ऐसे में ये मीठी यादें ही जीने को सही मकसद देती हैं.

कोरोना-विशेषज्ञों ने खिड़की-दरवाजे खुले रखने को कहा था, ताकि ताजी हवा आती रहे और कोरोना का वायरस दूर रह सके.

मधुरिम यादों का दरीचा खुल जाने से कुछ राहत महसूस हुई.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “राहत

  1. मधुरिम यादों के दरीचे में जब पुरानी भारतीय सभ्यता और संस्कृति पुनर्जीवित हो उठे तो मन में मान-सम्मान और मआत्मबल का उन्नयन हो जाता है. मआत्मबल का यही उन्नयन राहत बन जाता है.

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