कविता

राष्ट्रहित

राष्ट्र हित
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सर्वोपरि है राष्ट्र हमारा ,सर्वोपरि यह देश है |
इसकी रक्षा के हित धारा,हमने यह नर वेश है |

काट गुलामी की जंज़ीरे,लहराया है ध्वज अपना |
नई डगर नूतन मंज़िल गढ़ , डंका जग में बजा दिया |

संकट में हे वीरों तुमने ,धीरज कभी नहीं खोया |
सिंचित धरती करी लहू से ,प्रगति बीज उसमे बोया |

विकट समय गहराया संकट,कठिन वक्त फिर आन पड़ा |
शत्रु अदृश्य खा रहा जीवन,डगर डगर पर तना खड़ा |

संकल्पों का दीप जला कर,उजियारा करना होगा |
धीरज, धर्म, कर्म के रथ चढ़,दुश्मन से लड़ना होगा |

भारत कभी नही हारा है, जीत उसी की होनी है |
सत्य सनातन ही साश्वत है,सुयश कीर्ति दिन दूनी है|

घर में रह कर्तव्य निभाओ दुख घन भी छँट जाएंगे |
दूरी रख गर वार करोगे,शत्रु नही बच पाएंगे |

कर्म वीर योद्धाओं तुमको शत शत नमन ‘मृदुल’ करती |
अक्षय होगा देश हमारा, आस विजय निश्चित करती |

मंजूषा श्रीवास्तव ‘मृदुल
लखनऊ (यू पी)
स्वरचित

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016