कविता

बात कुछ भी नहीं…

बात कुछ  भी नहीं  बस मामूली है ।
मंजर कातिलाना खंजर ये खूनी है ।।
कट रहे हैं रोज यहां !
लूट रहे हैं रोज यहां !!
जिंदगी क्या है एक कटी पतंग है ,
इंसान  जैसे  यहां  गाजर मूली है ।
मंदिर शिवालय है सूना सूना !
प्रलय बढ़ रहा है  कई  गुना !!
बारिश हो  या तपती  धूप खड़े हैं ,
छतरी लिए ज्यौं मधुशाला खुली है ।
खाली पेट नंगे  पांव दरबदर !
कैसे पहुंचे होंगे गांव दरबदर !!
यह घाव हमेशा  याद रखेगी जन  ,
बूंद बूंद रक्त जो इन्होंने असूली है ।
बारिश की बूंदों से नहाया हूं !
नहाकर बड़ा ही  इतराया हूं !!
कहा था गंदगी बदरंग ज़मीर बहाने को ,
सिर्फ  जिंदगी  और  जमीन ही धुली है ।
चेली बेटी का रिश्ता कहां गया !
रोजी रोटी का वास्ता कहां गया !!
संस्कृति नहीं सिखाता आपस में बैर रखना ,
एक तरफ शूली दूसरे तरफ त्रिशूली है ।
बात कुछ  भी नहीं बस  मामूली है ।
मंजर कातिलाना खंजर ये खूनी है ।।

मनोज शाह 'मानस'

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