कुण्डली/छंद

डी.टी सी. (छप्पय छंद)

डी.टी सी. की बस में चढ़कर, अपनी शामत आई,
मैं हंसने की इच्छा रखता, आती रोज रुलाई.
आती रोज रुलाई, निगोड़ी बस नहीं आती,
आती है तो बिना रुके ही, वह आगे बढ़ जाती.
लटक-लटककर किसी तरह, पकड़ी तो बस ऐसी,
गिरे, टांग की हड्डी टूटी, वाह री (कयामत) बस डी.टी सी.
19.1.1985

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

One thought on “डी.टी सी. (छप्पय छंद)

  • लीला तिवानी

    छंद की परिभाषा-
    वर्णो या मात्राओं के नियमित संख्या के विन्यास को छन्द कहा जाता है।
    छंद के अंग——-मात्रा——–
    1. मात्रा : ह्रस्व स्वर जैसे ‘अ’ की एक मात्रा और दीर्घस्वर की दो मात्राएँ मानी जाती है । यदि ह्रस्व स्वर के बाद संयुक्त वर्ण, अनुस्वार अथवा विसर्ग हो तब ह्रस्व स्वर की दो मात्राएँ मानी जाती है । पाद का अन्तिम ह्रस्व स्वर आवश्यकता पडने पर गुरु मान लिया जाता है ।

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