सामाजिक

घूंघट – एक कुप्रथा

कितने बरस लाड प्यार से अपने बाबा के आंगन में पली बढ़ी  संस्कारों से पूर्ण स्वरा जब ब्याह के ससुराल आती है तो सबसे पहला तोहफा उसे जो मिलता है वो था गज भर लंबा घूंघट….
बाईस बरस की उम्र,मायके में कभी ना देखा ऐसा नया माहौल , गहने,कपड़े, लाज ,शरम और घूंघट,
घूंघट ,जिसके सिर से ना गिरने को सख्त हिदायत दी थी स्वरा की सासू मां ने, पापा की नन्ही सी जान कैसे संभालेगी सब कुछ,स्वरा समझ ही नहीं पा रही थी।पापा शुरू से ही आजाद ख्यालों के थे और नारी जाति को वहीं सम्मान देने के पक्षधर थे जो पुरुषों को मिलता है, पकफेरे के लिए मायके गई स्वरा ने घर में घुसते ही सबसे पहले साड़ी को यूं उतारा जैसे बरसो की जेल काटकर आई हो और फूट फूट कर रोने लगी,पापा ने पूछा तो बोली पापा मेरा दम घुट जायगा वहां, कैसे काटूंगी पूरा जीवन इस घूंघट में,जिसके दूसरे छोर से मुझे दिखाई भी नहीं देता मै लड़खड़ाकर गिर जाती हूं, सब मुझ पर हंसते है क्या इसी दिन के लिए आपने मुझे पढा लिखाकर बड़ा किया था।स्वरा की आंखो में छलकता दर्द कैसे दूर करें उसके पापा को समझ ही नहीं आ रहा था।पर अब कुछ नहीं ही सकता था इसलिए बस सांत्वना दिए जा रहे थे।
केवल स्वरा है नहीं स्वरा की ही तरह आज भी हमारे देश की हजारों लाखो महिलाएं इस घूंघट के नीचे अपने सपनों का होम करती आ रही है,आज भी हमारे देश के गांवों और कस्बों में घूंघट को इज्जत का नाम दिया जाता है।माना कि शहर आधुनिकता की अंधी दौड़ में काफी आगे निकल गए है पर गांव और कस्बों में स्थिति आज भी बद से बदतर है। एक और जहां माता पिता बेटियों को पढ़ाना तो सीख गए है लेकिन दूसरी और वहीं माता पिता जब सास ससुर बनते है तो बहुओं के सिर पर घूंघट रखना नहीं भूलते।आज भी बहू बनते ही एक लड़की से अपेक्षा की जाती है कि वो घर की सभी जिम्मेदारियां अच्छे से बिना किसी शिकायत के उठाए,सारे रितिरिवाज निभाए,परंपराओं का पालन करें।
आज इसी समाज से कुछ प्रश्न पूछती हूं! कि जब आप अपनी बेटियों को संस्कार,रितिरिवाज,परंपराएं सिखाते ही नहीं ,जब आप अपनी चोबीस बरस की बेटी को छोटा बताकर उसके खाने की थाली उसके हाथ में पकड़ाते हो,
उससे इसलिए काम नहीं कराते कि ससुराल में तो करना ही है बेटा तू रहने दें। जब आप अपनी बेटी को मायके में छोटे छोटे कपड़े पहने देखकर खुश होते हो तो कैसे भूल जाते हो कि जिस लड़की को आपका बेटा ब्याह कर लाया है वो भी किसी की बेटी है।उसकी भी कुछ इच्छाएं होंगी।
क्या जो संस्कार आपने अपनी बेटी को दिए है जिन आदतों के साथ आपने उसे पाला है आपको लगता है वो किसी का घर सम्भाल पाएगी,क्या  जिस तरह के कपड़े उसने मायके में पहने है आपको लगता है कि वो घूंघट सिर पर रख पाएगी,क्या जो लड़की अपनी मां के बीमार होने पर उसकी किसी कार्य में मदद  नहीं करती क्योंकि उसे तो काम करने की आदत ही नहीं क्या वो लड़की सास ससुर के बीमार पड़ने पर उनका दर्द बाट पाएगी,उनकी सेवा कर पाएगी,फिर क्यों हम उसी युग, उसी पीढ़ी की एक लड़की जो हमारी बहू बनकर आई है, उस पर सत्ता करना प्रारंभ कर देते।
क्या आपको लगता है इस तरह घूंघट में रहकर वो कभी आपको माता पिता का सम्मान दे पाएगी,क्या कभी वो आपको दिल में जगह दे पाएगी, क्या कभी आपसे ऊंची आवाज में बात नहीं करेगी तो आप गलत सोचते है।जिस सम्मान की अपेक्षा आप अपनी बेटी के लिए उसके ससुराल में करते है वहीं सम्मान अपनी बहू को भी देना सीखिए।उसके विचार उसकी भावनाओं का सम्मान कीजिए। देखिए आपके जीवन में एक बेटी की कमी आपको कभी महसूस नहीं होगी।
हमारी संस्कृति भी तो यही कहती है कि हम बेटा – बेटी ,बहू – बेटी  में भेद न करें।हमारे ज्यादातर महान राजाओं ने अपनी रानियों  को सम्मान के साथ सिंहासन पर अपने साथ बिठाया है ,घूंघट में नहीं रखा।उनकी इच्छाओं को ,सलाह को और सम्मान को हमेशा महत्व दिया है।ये बाल विवाह ,पर्दा प्रथा बेटी बेटे का फर्क ,हमारी  ही बनाई कुप्रथाएं है हमें इन्हे ख़तम करने का प्रयास करना है , बढ़ाना नहीं है।
सम्मान और लाज नजरों में होती है घूंघट में नहीं,स्त्रियों को सम्मान दें।अगर हमारी बहू बेटियों के सिर पर घूंघट की जगह बुजुर्गो का आशीर्वाद भरा हाथ होगा तब शायद हम अपने देश और संस्कृति के उत्थान में ज्यादा योगदान दे पाएंगे क्योंकि तब शायद किसी स्वरा का दम नहीं घुटेगा ससुराल में, और वो भी सहयोग कर पाएगी देश,समाज और संस्कृति के उत्थान में।

— अनामिका लेखिका

परिचय - अनामिका लेखिका

जन्मतिथि - 19/12/81, शिक्षा - हिंदी से स्नातक, निवास स्थान - जिला बुलंदशहर ( उत्तर प्रदेश), लेखन विधा - कविता, गीत, लेख, साहित्यिक यात्रा - नवोदित रचनाकार, प्रकाशित - युग जागरण,चॉइस टाइम आदि दैनिक पत्रो में प्रकाशित अनेक कविताएं, और लॉक डाउन से संबंधित लेख, और नवतरंग और शालिनी ऑनलाइन पत्रिका में प्रकाशित कविताएं। अपनी ही कविताओं का नियमित काव्यपाठ अपने यूटयूब चैनल अनामिका के सुर पर।, ईमेल - anamikalekhika@gmail.com

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