कविता

सृष्टि का आधार हो

नारी! नहीं केवल श्रद्धा हो, सृष्टि का आधार हो।
शक्ति रूपिणी, माँ दुर्गा हो, प्रेम की पारावार हो।
शहनशक्ति की सीमा हो तुम।
परिवार हित, बीमा हो तुम।
तुम ही प्रेयसी, भगिनी, माता,
सहधर्मिणी, वामा हो तुम।।
गृहलक्ष्मी तुम, धन की देवी, ज्ञान को देती धार हो।
नारी! नहीं केवल श्रद्धा हो, सृष्टि का आधार हो।।
तुम हो अल्पना, तुम हो कल्पना।
तुम्हीं दिखातीं, नर को सपना।
सर्वस्व ही, न्यौछावर करतीं,
जिसे मानती हो वश अपना।
शिव की शक्ति, भक्त की भक्ति, त्रिगुणों की तुम सार हो।
नारी! नहीं केवल श्रद्धा हो, सृष्टि का आधार हो।।
राष्ट्रप्रेमी की यही कामना।
सीमित रहे ना, कोई भावना।
उन्नति के नित शिखर चढ़ो तुम,
नहीं चाहता, तुम्हें थामना।
जहाँ पर जातीं, स्वर्ग बनातीं, भले ही कारागार हो।
नारी! नहीं केवल श्रद्धा हो, सृष्टि का आधार हो।।

परिचय - डॉ. संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

जवाहर नवोदय विद्यालय, महेंद्रगंज, दक्षिण पश्चिम गारो पहाड़ियाँ, मेघालय-794106, ई-मेलः santoshgaurrashtrapremi@gmail.com, चलवार्ता 09996388169, rashtrapremi.com, www.rashtrapremi.in

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