लेख सामाजिक

मर्दवादी सोच या नामर्दवादी चिंतन !

मर्दवादी सोच या नामर्दवादी चिंतन ! मैंने अपने दादाजी को कभी नहीं देखा, मेरी दादी के पैर छूते हुए । पिताजी को भी नहीं देखा है, माँ के चरणस्पर्श करते हुए, जबकि दादी को दादा के और माँ को पिता के चरणस्पर्श करते देखते आया हूँ । कहने को दादी, दादा की और माँ, पिता की अर्द्धांगिनी हैं।

इतना ही नहीं, दोनों यानी पति-पत्नी एक-दूजे के लिए बने होते हैं ! यह सिर्फ़ कहने भर को मर्दवादी सोच है । परिवार में एक पत्नी को पति के समक्ष बराबरी का दर्ज़ा हासिल नहीं है, यहाँ तक दोनों हमउम्र के नहीं होते ! महिलाओं को पुरुषवादी सोच से बाहर आने होंगे, तभी स्त्रीशक्ति की अपनी महत्ता बची रह पाएगी !

तब इसे आप परम्परा और संस्कार कहेंगे ! फिर प्रत्येक फेमिनिज्म व्यक्तित्वों को कुपरम्परा और कुसंस्कारयुक्त विचारधाराओं को त्यागनी चाहिए । लोकतंत्र हो या रिश्ते ‘असहमति’ जरूरी है, इसे अगर आप मर्दवादी सोच कहते हैं, तो यह फ़ख़्त नामर्दवादी चिंतन है !

परिचय - डॉ. सदानंद पॉल

तीन विषयों में एम.ए., नेट उत्तीर्ण, जे.आर.एफ. (MoC), मानद डॉक्टरेट. 'वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' लिए गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स होल्डर, लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर, इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, RHR-UK, तेलुगु बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, बिहार बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर सहित सर्वाधिक 300+ रिकॉर्ड्स हेतु नाम दर्ज. राष्ट्रपति के प्रसंगश: 'नेशनल अवार्ड' प्राप्तकर्त्ता. पुस्तक- गणित डायरी, पूर्वांचल की लोकगाथा गोपीचंद, लव इन डार्विन सहित 10,000+ रचनाएँ और पत्र प्रकाशित. भारत के सबसे युवा संपादक. 500+ सरकारी स्तर की परीक्षाओं में क्वालीफाई. पद्म अवार्ड के लिए सर्वाधिक बार नामांकित. कई जनजागरूकता मुहिम में भागीदारी.

Leave a Reply