लघुकथा

प्रेम

“मैं तुमसे प्रेम करता हूँ।” पूरब के मुँह से अचानक यह सुन वृंदा चौंक गयी।
“प्रेम…….!”
“हाँ प्रेम,इस अथाह सागर की तरह गहन।” पूरब ने बाँहों को फैलाकर कहा।
“सागर की तरह! मतलब खारा।” हँसते हुए वृंदा ने कहा।
“उसके खारेपन को न देखो! उसकी गहराई को देखो।” वह बोला।
“प्रेम समझते हो तुम पूरब?”
“न समझता तो महसूस कैसे करता?”
“तो बताओ क्या है प्रेम?”अपनी हथेलियों पर ठोडी टिका वह पूरब को देखने लगी।
“तुम्हारी मुस्कान है प्रेम।तुम्हारे साथ जीने की इच्छा है प्रेम।तुम्हें खुद में और खुद को तुम में समाहित करना है प्रेम।”
‘तुम्हें सोचना, तुम्हें गुनगुनाना है प्रेम।तुम्हारे ऊपर मेरा हक प्रेम है।तुम्हारी चिंता प्रेम है।”पूरब ने वृंदा की आँखों में देखकर कहा।
“यह तो आदत है पूरब!प्रेम नही ।”वह बोली।
“प्रेम तो उस बारिश की बूंद की तरह है जो फूलों को हँसाने के लिए खुद मिट्टी में मिल जाती हैं किन्तु अस्तित्व नहीं खोती।प्रेम तो वह नदी है जो अपनी मिठास समुद्र को दे देती है और समुद्र को खुद के होने का एहसास कराती है।”
“नदियों को सहारा देता है सागर तभी तो वह उसमें समा जाती हैं।”पूरब बोला।
“नहीं पूरब,सागर नदियों को सहारा नही देता बल्कि नदियां सागर को जीवन देती हैं खुद को नष्ट करके।”
“तो यह जीवन मुझे दे दो ना!घुलमिल जाओ मुझमें।”वह अधीरता से बोला।
“घुल जाऊं यानि अपना अस्तित्व मिटा कर?क्या तुम सच में मुझसे प्रेम करते हो?”
“तुम्हें विश्वास क्यों नहीं हो रहा?”पूरब ने कहा।
“क्योंकि तुम प्रेम में मुझे पूरब बनाने की इच्छा रखते हो वृंदा नहीं।जिस दिन तुममें वृंदा बनने की इच्छा जागेगी उस दिन तुम्हारे प्रेम पर विश्वास कर लूंगी।”
— दिव्या राकेश शर्मा

परिचय - दिव्या राकेश शर्मा

पता-गुरूग्राम हरियाणा विधा-लघुकथा, कहानी, कविता, गजल नुक्कड़ नाटक। उपलब्धि-प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में रचनाओं का लगातार प्रकाशन, दैनिक भास्कर में साक्षात्कार प्रकाशित, जुगरनाट वेबसाइट में साक्षात्कार प्रकाशित, नुक्कड़ नाटक संस्थान द्वारा लघुकथाओं का मंचन व नुक्कड़ नाटक का मंचन। साझा काव्य संग्रह, साझा लघुकथा संग्रह प्रकाशित। किस्सा कोताह पत्रिका में बाल रचनाओं का सहसंपादन।

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