लघुकथा

साहस चक्र

बहुत दिनों से दीदी की कमर में दर्द हो रहा था. कुछ सहकर, कुछ हंसकर वे टालती जा रही थीं.

”पैर पर रखकर बैठना न केवल अशोभनीय है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी है. इससे कमर में दर्द की शिकायत हो सकती है.” उसके सामने एक लेख आ गया.

दीदी ने तुरंत अपने साहस चक्र का आह्वान किया और कमर दर्द छू मंतर हो गया.

तभी कुछ भाई-बहिनों के ब्लॉग पर कामेंट्स का लॉकडाउन समाप्त हो गया. पता लगते ही उन्होंने सभी को मैसेज भेजकर सूचित कर दिया.

”लीजिए सभी सभी लेखों पर प्रतिक्रिया प्रकाशित होनी शुरु हो गई है.” पढ़कर गौरव द्विवेदी अचंभित हो गए.

”आदरणीय दीदी सादर प्रणाम, मैं समझा नहीं.” गौरव भाई का मैसेज आया.

”कैसे समझेंगे? बहुत दिनों से आपने अपना ब्लॉग पब्लिश ही नहीं किया. 20-25 दिनों से आपके और अनेक भाई-बहिनों के के ब्लॉग पर कामेंट नहीं आ रहे थे, कल रात से सब के ब्लॉग पर कामेंट आने शुरु हो गए.”

”जी, अब समझा. कोरोना की वजह से फार्मा में वर्कलोड बहुत है और मैनपावर बहुत कम, जो है उसमें से भी कोरोना पॉजिटिव निकल आता है कोई न कोई.” गौरव जी व्यथित थे.

”हमें आपकी व्यस्तता का पूरा अहसास है. आपसे कोई शिकायत नहीं है. सबको मैसेज भेजा, तो आपको भी भेज दिया. फार्मा वालों की मेहरबानी से कोरोना कुछ नियंत्रित हुआ है.”

”आपने बहुत अच्छा किया इसी बहाने नोटिफिकेशन देख कर आपसे बात कर पाया और आपका आशीर्वाद ले पाया. वरना हर इंसान डरा हुआ है.” गौरव भाई ने तनिक रुककर लिखा.

”हमारा आशीर्वाद हमेशा आपके साथ है. यही तो हमारी पूंजी है! सब ठीक हो जाएगा.” दीदी ने आश्वस्त करते हुए लिखा.

”इस बार तो लोगों की जीवटता और उनके धैर्य ने सबको सुरक्षित रखा है. इसमें फार्मा का कोई खास योगदान नहीं है बस सहयोग है.”

”सहयोग और सांत्वना ही तो प्रमुख हैं. हम तो आपको कोरोना वारियर मानते हैं.”

”मुझे विश्वास है दीदी कि ये कोरोना आज चाहे जान माल का कितना भी नुकसान करले लेकिन कल जब दुनिया इस संकट से उबर कर सामने आएगी तो नई जीवनशैली और एक नई विचारधारा के साथ आएगी. भारतीय संस्कृति और भारतीय योग व आयुर्वेद की एक नई इबारत लिखी जाएगी ऐसा मेरा विश्वास है.”

”आपने बिलकुल दुरुस्त फरमाया है.” दीदी ने गौरव भाई के विश्वास से सहमति जताई.

”इस कोरोना ने हमसे अगर काफी कुछ छीना है तो बहुत कुछ सिखा कर भी जाएगा, एक नई दिशा मिलेगी और नए समाज का नया पथ भी प्रदर्शित होगा. कहते हैं ना कि ईश्वर की इच्छा के बिना कभी कुछ नहीं होता और जो होता है वो अच्छे के लिए ही होता है. देखिए न हम जितना प्रकृति, अपनी संस्कृति और सभ्यता से दूर हो गए थे, कोरोना ने 3 महीनों में ही सिखा दिया कि मनुष्य प्रकृति के बिना कुछ नहीं उसको प्रकृति और विज्ञान को साथ लेकर ही चलना पड़ेगा.”

”सही बात है.”

”जो काम बड़े-बड़े वैज्ञानिक नहीं कर पा रहे उसको हमारा 1 रुपये का नींबू और 40 रुपये का काढ़ा कर रहा है. पूरी दुनियां के वैज्ञानिक जिस कोरोना को मारने की वैक्सीन बनाने की अभी तक असफल कोशिश में अरबों खरबों खर्च कर रहे उसको हमारा आयुर्वेद तुलसी, गिलोय मुलेठी जैसी फ्री में मिलने वाली जड़ी बूटियों से कर रहा है. ये ईश्वर का बहुत बड़ा संदेश है कि प्रकृति के बिना मनुष्य अस्तित्व विहीन है. हम भारतीय तो सिर्फ गर्म पानी पीकर ही ठीक हो रहे हैं.” गौरव भाई का विश्वास अटल था.

”वाह क्या बात है! सही कह रहे हैं. हमने पूरे जीवन में इतने नींबू नहीं खाए, जितने इन दिनों खाए हैं. अदरक के पाउडर का भी प्रयोग कर रहे हैं.”

”दालचीनी, लौंग, कालीमिर्च, अदरक/सोंठ, तुलसी, गिलोय और मुलेठी से घरपर ही काढ़ा तैयार कर लीजिए.” गौरव भाई ने बताया.

”जी, रोज रेडियो पर बताते रहते हैं.” दीदी ने सहमति जताई.

”हम लोग तो बना कर डिब्बा बन्द मार्केट में भेज रहे हैं बस कंपनी का लोगो लगा है बॉक्स पर.
100ग्रा तुलसी, 20ग्रा दालचीनी, 25ग्रा गिलोय, 25ग्रा मुलेठी, 20ग्रा सोंठ, 5ग्रा, कालीमिर्च, 5ग्रा लौंग और 2 ग्रा पीपली को ग्राइंड करके रख लीजिए
और 200 ml पानी में 1 छोटा चम्मच से कम डालकर उबाल लें जब पानी आधा रह जाये तब छान कर उसमें थोड़ा नींबू निचोड़ कर सिप-सिप कर पी लें.
और यदि घर पर कोई आ जाये तो उसको भी यही पिलाएं 😂😂🤣🤣.”

”आइए. आपको भी पिलाते हैं.” दीदी ने आमत्रित किया.

”ईश्वर ने चाहा तो एक दिन आपका आशीर्वाद लेने अवश्य आऊंगा.”
रात के ग्यारह बजने को थे, अतः शुभ रात्रि से संवाद का समापन हुआ, लेकिन चलने से पहले गौरव भाई साहस चक्र को प्रस्फुटित करने का देसी नुस्खा दे गए थे.

”वास्तव में हमारे पास श्री कृष्ण जी जैसा सुदर्शन चक्र भले ही न हो, मन के अंदर साहस चक्र अवश्य होता है. एक बार साहस चक्र उद्भासित प्रस्फुटित हो जाए, तो हर संकट हमसे दूरी बनाए रखता है. अपने आत्मबल को जगाकर इस साहस चक्र को उद्बोधित किया जा सकता है.” दीदी का विश्वास था.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “साहस चक्र

  1. सबको कविता करते देख इंद्रेश भाई ने इसी साहस चक्र को प्रस्फुटित किया और ”मैं तुम्हें कैद करना चाहता हूँ !” जैसी सदाबहार कविता लिख भेजी, जो सदाबहार काव्यालय: तीसरा संकलन का आगाज़ करने वाली पहली कविता बनी. इसी साहस चक्र को प्रस्फुटित करते उन्होंने बाल गीत ”कवि का लहू” लिख दिया, जो अपने में नायाब बन पड़ा है. इस बाल गीत के प्रकाशित होते ही एक और बाल गीत ”मैं तो बच्चा हूँ जी” लिख भेजा. वे यहीं पर चुप नहीं बैठे. उनका मनन-मंथन चलता रहा और थोड़ी देर बाद कुछ और पंक्तियां भी इस बाल गीत में जोड़ने के लिए भेजीं. अपने को कवि न मानने वाले इंद्रेश भाई के पास ऊर्जा की कमी नहीं है, बस अपने आत्मबल को जगाकर इस साहस चक्र को उद्बोधित किया. प्रतिक्रिया में इंद्रेश भाई की शब्दावली देखिए- ”सावन मास उर्वरकता का माह है, विभिन्न प्रजाति के कीट पतंगे दिखते हैं, पौधे, पुष्प आदि अंकुरित होते हैं, इसलिये सावन मास के इस ब्लॉग पर भी यही हुआ है हर कविता एक अलग रंग लिये हुए है.” इंद्रेश भाई, उमंग, उत्साह और तरंग से अपने साहस चक्र को इसी प्रकार उद्भासित किए रखिए.

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