गीतिका/ग़ज़ल

वो सबके आँगन में है

राम रमा कण-कण में है.
सुमिरो वो सुमिरन में है.

तुलसी जैसी भक्ति करो,
मिलता वो चन्दन में है.

शबरी जैसी चाहत हो,
आ जाता वो वन में है.

आज न सिर्फ़़ अयोध्या में,
राम सभी के मन में है.

हम घर बैठे लेकिन मन,
लगा भूमि पूजन में है.

आँगन-आँगन दीप जले,
वो सबके आँगन में है.

डॉ कमलेश द्विवेदी

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