लघुकथा

पंजीरी

”हंसता हुआ नूरानी चेहरा, काली जुल्फें रंग सुनहरा——” शादी वाला घर था, इसलिए थिरकने वाले खुशनुमा गाने बज रहे थे.

”पापा आपकी पसंद का गाना लगा दिया है, आप खुश हो ना!” महेश ने कान से डोरे निरंजन जी से ऊंची आवाज में कहा.

”अच्छा!” निरंजन जी का ध्यान अब गाने की ओर गया. एक पल को हंसकर वह पत्नी के ख्यालों में खो गए.

”सचमुच चेती का हंसता हुआ नूरानी चेहरा ही तो था! भारत-विभाजन की भनक पड़ते ही लोगों ने आनन-फानन अपने नाबालिग बेटी-बेटों का ब्याह रचा दिया था. निरंजन जी के पापा ने भी चेती और उसकी बड़ी बहिन मोना की शादी अपने दो बेटों से रचा दी थी.” निरंजन जी को याद आ रहा था.

”हंसता हुआ नूरानी चेहरा लिए चेती 14 की भी नहीं हुई थी तब! अल्हड़ बाला की अल्हड़ता कितनी मनमोहक थी!”

”हंसी क्या बरसों तक टिक सकी?”

”मोना के घर हर साल कैलेंडर छपने लगा और चेती उसके यहां पंजीरी बनाने जाती रही. उसने तो 18 साल तक अपनी पंजीरी की प्रतीक्षा की और बहिन के लिए बनाई पंजीरी चखी तक नहीं.” निरंजन जी के सामने चेती का उदास चेहरा आ गया.

”सबके सामने हंसता हुआ नूरानी चेहरा एकांत में उदास चेहरा क्या था, ग़म का सागर ही था और पूजा के समय प्रभु के सामने अश्कों का बहता दरिया!”

”कोई कहता व्रत-पूजा करो, कोई कहता झाड़ा करवाओ. उसने सब किया. पर भारतीय संस्कृति की पोषक होने के कारण किसी बाबा का आश्रय नहीं लिया.

”आखिर डॉक्टर्स की मेहनत रंग लाई. तब तक 18 साल बीत चुके थे. अवसाद और तानों-तुनकों से हृदय छलनी हो गया था और मस्तिष्क कमजोर. संतान की आस ने कुछ राहत दी थी, पर डॉक्टर्स का कहना था- ”बड़ा ऑपरेशन” होगा.” निरंजन जी के मन की व्यथा से व्यथा खुद भी व्यथित हो उठी थी.

”उन दिनों सीजेरियन का नामोनिशान नहीं था. ”बड़ा ऑपरेशन”, वो भी दिल और दिमाग की कमजोरी के साथ!”

”चिंता की कोई बात नहीं.” डॉक्टर पद्मा ने कहा. मैं सब कुछ संभाल लूंगी. डॉक्टर पद्मा के कोमल-कमनीय हाथ का स्पर्श ही चेती में चेतनता ले आता था. उनका विश्वास भरा आश्वासन चेती का आधार.

”बड़ा ऑपरेशन” हुआ, सफल भी हुआ और डॉक्टर पद्मा को इस केस पर राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार भी मिला. पर चेती को पंजीरी न मिल सकी. दिल-दिमाग की कमजोरी के साथ ”बड़ा ऑपरेशन” और पंजीरी! सवाल ही नहीं उठता! लिहाजा न चेती को पंजीरी मिली, न निरंजन जी ही कभी उसका स्वाद चख सके.

चेती तो महेश को बड़ा करती-करती अगली दुनिया की ओर बढ़ गई, पर निरंजन जी ने महेश को दूल्हा बनते हुए देखा. फिर घर में दो बार पंजीरी बनती भी देखी. महेश ने जी भर पंजीरी खाई, पर निरंजन जी कैसे खा सकते थे! चेती जो नहीं खा पाई! अब पोते की शादी हो रही है, फिर पंजीरी बनने के अवसर आएंगे, पर न चेती को पंजीरी मिली, न वे उसका स्वाद चख पाएंगे!

”पापा, ममी जी की पसंद का गाना लगा दिया है. नाच रे मयूर झनझना के घुंघरू, बाकड़ बम बम—.” उम्र के ढलाव पर पहुंचने वाले निरंजन जी अशक्त होने के कारण खुशी में सक्रिय रूप से तो सम्मिलित नहीं हो पा रहे थे, पर बीच-बीच में बेटा-बहू आकर उनकी सुध ले रहे थे और उन्हें खुशी में शामिल भी कर रहे थे.

”अच्छा!” खुश होते हुए निरंजन जी ने बहू रति को खुश रहने का आशीर्वाद दिया.

पल भर को आरोहित हुई खुशी फिर पंजीरी की तलाश में तिरोहित हो गई थी.

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

One thought on “पंजीरी

  • लीला तिवानी

    माहौल में हैप्पी मूडिंग गाने बजने पर भी पर भी निरंजन जी के मन में उदासी ने डेरा जमाया हुआ था, उनकी प्यारी पत्नी चेती को पंजीरी न मिलने की व्यथा क्या भूलने वाली थी! चाहते हुए भी निरंजन जी न तो चेती को भुला पाते, न चेती की चाहत पंजीरी को, खुश होना भी चाहते तो कैसे खुश होते भला!

Comments are closed.