सामाजिक

शिक्षकों में आधुनिक वर्ण-संस्कार !

नियोजित शिक्षक मन्ने ‘आपदा शिक्षक’ ! बिहार सरकार को चाहिए, वे नियोजित शिक्षकों के विभाग बदल देने की कृपा करें ! उन्हें ‘शिक्षा विभाग’ से हटाकर ‘आपदा प्रबंधन विभाग’ में डाल दीजिए, क्योंकि ऐसे शिक्षकों को बिहार शिक्षा विभाग ने तो ‘आपदा शिक्षक’ बना छोड़े हैं।

इनकी चित भी उनकी नहीं है, पट तो है ही नहीं ! चित और पट — दोनों तरह का खेल बिहार सरकार वर्ष-2006 से इनके साथ खेल रहे हैं! बिहार में शिक्षकों के वर्ण तो देखिए–

“शिक्षकों के वर्ण
नियमित शिक्षक माने ब्राह्मण,
शिक्षक नेता माने क्षत्रिय,
कोचिंगवाले शिक्षक माने वैश्य,
नियोजित शिक्षक माने शूद्र?”

फिर तो क्षत्रिय कौन है, यह देखिये–

“भारत के
सभी जातियों में राजा हुए हैं,
फिर राज परिवार के पूत (पुत्र)
यानी राजपूत !
तो फिर ‘राजपूत’
सिर्फ़ एक जाति
कैसे हो गए ?”

अब ब्राह्मण कौन है, यह देखिये–

“माया में रमे व्यक्ति
‘ब्रह्म’ को पा नहीं सकते !
जो ब्रह्म को पा लिए हैं,
वही ब्राह्मण है !
बताइये,
अभी ‘ब्राह्मण’ है ?”

अंतत:, यही कहना है–

“नाम के साथ
जातिगत ‘उपनाम’ ढोनेवाले
हर व्यक्ति
कट्टर जातिवादी हैं ?
भारतीय संविधान का
अनुच्छेद-15
‘मनुस्मृति’ के
वर्ण-संस्कार की
व्याख्या को
मान्यता नहीं देता !”

परिचय - डॉ. सदानंद पॉल

तीन विषयों में एम.ए., नेट उत्तीर्ण, जे.आर.एफ. (MoC), मानद डॉक्टरेट. 'वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' लिए गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स होल्डर, लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर, इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, RHR-UK, तेलुगु बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, बिहार बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर सहित सर्वाधिक 300+ रिकॉर्ड्स हेतु नाम दर्ज. राष्ट्रपति के प्रसंगश: 'नेशनल अवार्ड' प्राप्तकर्त्ता. पुस्तक- गणित डायरी, पूर्वांचल की लोकगाथा गोपीचंद, लव इन डार्विन सहित 10,000+ रचनाएँ और पत्र प्रकाशित. भारत के सबसे युवा संपादक. 500+ सरकारी स्तर की परीक्षाओं में क्वालीफाई. पद्म अवार्ड के लिए सर्वाधिक बार नामांकित. कई जनजागरूकता मुहिम में भागीदारी.

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