लेख स्वास्थ्य

आएं करें शरद ऋतु का स्वागत

अाएं करें शरद ऋतु का स्वागत
*************************
मानसून अब विदाई की ओर चल पड़ा है. काले काले घने बादलों का डेरा उठने लगा है. दामिनी भी थक चुकी है.आसमां का नील वर्ण विस्तृत होने लगा है. रुई के सफेद फायों जैसे बादल आसमां में मंडराने लगे हैं. क्वार मास लग गया. पितृ पक्ष का प्रारंभ हो गया. धूप चटक हो गई. रात का अंतिम पहर ठंड का अहसास कराने लगा और इन सबके साथ ही गांव की पगडंडियों व खेतों-खलिहानों में कास के सफेद फूल अपनी महक बिखेर रहे हैं. यह सब संकेत दे रहे है कि वर्षा ऋतु बीत रही है और शरद ऋतु आने को आतुर है. मौसम के जानकार कवि घाघ ने ‘फूलहीं कास शरद ऋतु आयी’ कहकर संकेत दिया कि कास खिलना शुरू हो चुका है अर्थात शरद ऋतु आने वाली है.
अाइए शरद ऋतु का स्वागत करें.
स्वास्थ की दृष्टि से यह ऋतु बहुत लाभदायक है . जो खाओ पच जाता है. इस ऋतु में हमारा आहार कैसा होना चाहिए:
क्षेम कुतूहल शास्त्र में आता हैः

आहारान् पचतिशिखि दोषानाहारवर्जितः।
दोषक्षये पचेद्धातून प्राणान्धातुक्षये तथा।।

अर्थात् पाचक अग्नि आहार को पचाती है. यदि उचित समय पर, उचित मात्रा में शरीर को आहार न मिले तो यह अग्नि शरीर की धातुओं को जला डालने के बाद, प्राणों को जला डालती है, यानी प्राणों का नाश कर देती है.

अतः शीतकाल में जरूरी है कि समय पर नियमित रूप से पाचन शक्ति के अनुसार अनुकूल मात्रा में पोषक तत्वों से युक्त आहार खूब चबा-चबाकर खाना चाहिए.

इस ऋतु में स्निग्ध (चिकने) पदार्थ, मौसमी फल व शाक, घी, दूध, शहद आदि के सेवन से शरीर पुष्ट और बलवान बनता है. कच्चे चने रात को भिगोकर प्रातः खूब चबा-चबाकर खाना, गुड़, गाजर, केला, शकरकंद, सिंघाड़े, आँवला आदि का सेवन हितकारी रहता है.

तेलमालिश करना, प्रातः दौड़ना एवं भ्रमण , व्यायाम, योगासन करना, ताजे या कुनकुने जल से स्नान करना आदि लाभदायक हैं।
शीत ऋतु में क्या सेवन नहीं करना चाहिए:

इस ऋतु में कटु, तिक्त व कषाय रसयुक्त एवं वातवर्धक पदार्थ, हल्के रूखे एवं अति शीतल पदार्थ का सेवन हानिकारक है. खटाई का अधिक प्रयोग न करें जिससे कफ ,खाँसी, श्वास, दमा, नजला, जुकाम आदि रोग न हों. ताजे दही, छाछ, नीँबू आदि का सेवन किया जा सकता है. भूख को मारना या समय पर भोजन न करना हानिकारक होता है .आलस्य करना, दिन में सोना, देर रात तक जगना, अति ठंड सहन करना आदि शीत ऋतु में वर्जित हैं। बहुत ठंडे जल से स्नान नहीं करना चाहिए.

कोई भी पेय पीना हो तो इड़ा नाड़ी अर्थात् नाक का बाँया स्वर चालू होना चाहिए. यदि दाँया स्वर चालू हो और पेय पदार्थ पीना आवश्यक जान पड़े तो दाँया नथुना दबाकर बाँये नथुने से श्वास लेते हुए पीयें.
भोजन या कोई भी खाद्य पदार्थ सेवन करते समय पिंगला नाड़ी अर्थात् सूर्य स्वर चालू रहना हितकर है. यदि न हो तो थोड़ी देर दाँयी करवट लेटकर या कपड़े की छोटी पोटली बाँयीं काँख में दबाकर स्वर चालू किया जा सकता है.

परिचय - ब्रजेश गुप्ता

मैं भारतीय स्टेट बैंक ,आगरा के प्रशासनिक कार्यालय से प्रबंधक के रूप में 2015 में रिटायर्ड हुआ हूं वर्तमान में पुष्पांजलि गार्डेनिया, सिकंदरा में रिटायर्ड जीवन व्यतीत कर रहा है कुछ माह से मैं अपने विचारों का संकलन कर रहा हूं M- 9917474020

Leave a Reply