कविता

श्री राम हनुमान युद्ध ( 2)

कविता अधिक लंबी होने की वजह से आपने कल इसका प्रथम खंड ही पढ़ा था , आज पढिये दूसरा खंड 🙏  💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

श्री राम हनुमान युद्ध (2)
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गुरु की आज्ञा पालन को प्रभु
तज के निकले अपना धाम
धनुष हाथ ले विकट रूप धर
पूरा करने अपना काम
देव यक्ष गंधर्व सहित सब
चिंतातुर थी सृष्टि तमाम
क्या होगा तब आगे किस्सा
प्रभु पहुँचेंगे जब कपि के धाम
रवि की गति भी शिथिल हुई थी
असमंजस था मन में भारी
संकट में हैं केसरी नंदन
आज परीक्षा की है बारी
शरणागत की रक्षा करेंगे कि
स्वामिभक्त कहलाएंगे
जब कपि को सम्मुख पाएंगे
करेंगे क्या फिर राजा राम
सुनो सुनाता हूँ किस्सा ये
लेकर के श्री राम का नाम
क्यों कहते हैं लोग …..

देख के दूर से हनुमत को प्रभु
रामचंद्र मुस्काये थे
दोषी है वह राजन गुरु का
कपि को तब समझाए थे
कर दो उसको मेरे हवाले
पूरण हो जाए मेरे काम
सुनो सुनाता हूँ किस्सा ये
लेकर के श्री राम का नाम
क्यों कहते हैं लोग …..

नतमस्तक हो कपि तब बोले
नमन मेरा स्वीकार करो
शंका है मन में मम भारी
विनती है कि सुधार करो
प्राण जाए पर बचन न जाई
रघुकुल रीति सदा चली आई
मैं सेवक तुम स्वामी मेरे
मुझको भी ये बात सुहाई
माताजी ने वचन दिया है
रक्षा करना मेरा काम
सुनो सुनाता हूँ किस्सा ये
लेकर के श्री राम का नाम
क्यों कहते हैं ….

नादानी ना करो कपि तुम
क्षमा नहीं कर पाऊँगा
वचनपुर्ति की खातिर कुछ भी
करने से ना कतराउंगा
अंतिम है मौका ये सुन लो
सम्मुख उसको लाओ तुम
या फिर उठो सामना कर लो
समय व्यर्थ ना गंवाओ तुम
सुन के राम को हनुमत जी तब
मंद मंद मुस्काये थे
हाथ जोड़कर प्रभू राम को
माँ का वचन बताए थे
अभय दिया उसे माता ने
और पूरा करना मेरा काम
सुनो सुनाता हूँ किस्सा ये
लेकर के श्री राम का नाम
क्यों कहते हैं ……

कुपित हुए हैं प्रभु रामजी
सुनके हनुमत की बानी
भक्त जो कहना ना माने और
करता रहे जो मनमानी
बात से बात बने ना जब तो
रार पनप ही जाता है
सबकी अटकी थी सांसें अब
सम्मुख क्या क्या आता है
अब तो कोई विकल्प नहीं है
भक्त पे बाण चलाना है
माना बहुत ही कठिन काम है
वचन भी तो निभाना है
क्या कीजै अब है मजबूरी
प्रभु ने मन में है ठानी
सुनियो लोगों ध्यान लगा के
अचरज भरी हुई ये कहानी
क्या होगा अब हनुमत का
और क्या करेंगे राजा राम
सुनो सुनाता हूँ किस्सा ये
लेकर के श्री राम का नाम
क्यों कहते हैं लोग ……..

स्वरचित / मौलिक
राजकुमार कांदु
क्रमशः

 

परिचय - राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।

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