भाषा-साहित्य

देवनागरी लिपि के पथ की बाधाएँ और उपाय

यह सर्वमान्य तथ्य है कि यदि हमें अपनी भाषाओं का प्रचार – प्रसार करना है तो भाषा के साथ-साथ इनकी लिपियों को बचाए रखना भी अत्यंत आवश्यक है। लेकिन पिछले कई वर्षों में यह देखने में आ रहा है कि हिंदी ही नहीं अन्य ऐसी भाषाएं जो देवनागरी में लिखी जाती हैं उन्हें भी ज्यादातर लोग कंप्यूटर मोबाइल तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर रोमन लिपि में लिखने लगे हैं। निश्चित रुप से देवनागरी लिपि पर पड़ने वाली चोट प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हिंदी और भारतीय भाषाओं पर पड़ने वाली चोट है। इसलिए यह आवश्यक है कि देवनागरी लिपि के गुणगान के बजाय हम देवनागरी लिपि की राह की चुनौतियों और समस्याओं को समझ कर इन्हें दूर करने के उपाय करें।

किसी भी व्यक्ति के कानों में सर्वप्रथम अपनी मां की भाषा के शब्द ही पड़ते हैं इसलिए उसे मातृभाषा कहा जाता है। इसी प्रकार दुनिया में जब कहीं कोई विद्यालय में पढ़ने के लिए जाता है उसका सर्वप्रथम साक्षात्कार मातृभाषा की लिपि से ही होता है । भारत में हिंदी, मराठी, कोकणी , नेपाली, मैथिली डोंगरी, बोडो आदि भाषाएं जो कि लोगों की मातृभाषाएं है और देवनागरी लिपि में लिखी जाती हैं । अन्य देशों की तरह हमारे देश में भी इन भाषाओं के बच्चों का प्रथम साक्षात्कार अपनी मातृभाषा की लिपि यानी देवनागरी लिपि से भी तभी होना चाहिए जब वे पहले पहल विद्यालय में पहुंचते हैं। लेकिन अग्रेजी माध्यम के दौर और दौरे के चलते हम इस स्वभाविक राह को छोड़ते जा रहे हैं। अब हमारे देश में हमारे विद्यालयों द्वारा अपनी भाषा के साथ-साथ अपनी भाषा की लिपि को पछाड़ने की शुरूआत तभी से हो जाती है जब वह माँ-बाप की गोदी में बैठ कर स्कूल में प्रवेश करता है। बच्चों को ढाई – तीन साल का होते – होते नर्सरी स्कूलों में भेज दिया जाता है जहां उन्हें अंग्रेजी और अंग्रेजी की लिपि यानी रोमन लिपि रटाई जाती है। तब बच्चा ‘क, ख, ग’ नहीं बल्कि दिन रात वह ‘ए.बी. सी… ‘ रटता है। उसका प्रथम साक्षात्कार अपनी मां की भाषा और उसकी लिपि से न होकर रोमन लिपि से होता है और वह सालों तक उसे ही रटता रहता है। इसका परिणाम यह होता है कि उनके लिए लिपि का अर्थ, मुख्यतः रोमन लिपि ही हो जाता है।

आगे चल कर जब प्राथमिक कक्षाओं में आने के पश्चात उन्हें हिंदी विषय पढ़ाया जाता है तब उनका देवनागरी लिपि के परिचय होता है। लेकिन वहां भी स्थिति गंभीर होती है क्योंकि एक तो विद्यार्थी के माता-पिता और स्कूल प्रबंधन हिंदी को इतना महत्व ही नहीं देता जितना दिया जाना चाहिए। उस पर स्थिति यह भी है कि शिक्षक भी देवनागरी लिपि को वैज्ञानिक लिपि होने के बावजूद वैज्ञानिक विधि से नहीं पढ़ाते। मैंने स्वयं हिंदी और मराठी माध्यम तथा हिंदी विषय से पढ़ कर आए ऐसी अनेक युवाओं को देखा है जिन्हें 10- 12 वर्ष तक देवनागरी लिपि में हिंदी या मराठी आदि पढ़ने के बावजूद देवनागरी लिपि में बहुत से शब्दों और वर्णों को लिखने या उनके सही उच्चारण की जानकारी नहीं होती । यही कारण है कि रोमन लिपि के तार्किक और वैज्ञानिक न होने के बावजूद एक-एक शब्द की वर्तनी को रट-रट कर बच्चे सीख लेते हैं लेकिन देवनागरी लिपि के वैज्ञानिक व सरल होने के कारण बच्चे सीख नहीं पाते । इस स्थिति की गंभीरता का अंदाज मुझे तब हुआ जब मैंने उत्तर प्रदेश में माध्यमिक कक्षा में पढ़नेवाली अपने रिश्तेदार की बेटी को हिंदी का पत्र रोमन लिपि में लिखते देखा । हालांकि रोमन लिपि में उसकी हिंदी को समझना भी कोई आसान तो न था ।

अब अंग्रेजी माध्यम के चलते दूसरी बड़ी समस्या यह है कि बच्चे हिंदी या मराठी जो उन की मातृभाषा है, उसे छोड़कर अन्य सभी विषय अंग्रेजी में ही पढ़ते हैं । इसलिए वे अन्य सभी विषयों को लिखने के लिए रोमन लिपि का ही प्रयोग करते हैं। यही नहीं इसकी वर्तनी को रटने के लिए पूरी जिंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा दे देते हैं, क्योंकि उसके बिना वे किसी अन्य विषय में आगे बढ़ ही नहीं सकते। दूसरी ओर जब देवनागरी लिपि की बात आती है तो उसमें उपेक्षा के चलते जितना ज्ञान उन्हें होना चाहिए उतना हो नहीं हो पाता। नतीजतन अंग्रेजी माध्यम से पढ़ कर आए ज्यादातर बच्चे न तो ठीक से देवनागरी लिपि को पढ़ पाते हैं और न ही ठीक से लिख पाते हैं।

फिर स्कूली शिक्षा समाप्त करने के पश्चात उच्च शिक्षा में हिंदी के हटने और केवल अंग्रेजी के चलने से देवनागरी में जो लिखना – पढ़ना होता था, वह भी छूट जाता है। अंग्रेजी के मोह, आकर्षण और आतंक के चलते तब अपनी मातृभाषा का समाचार पत्र तक नहीं पढ़ते । हालांकि अब तो हिंदी के समाचारपत्रों में भी अंग्रेजी भाषा और रोमन लिपि परोस रक स्वयं को प्रगतिशील साबित करने की होड़ लगी है। फिर शासन-प्रशासन से ले कर निजी कंपनियों में अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण जहां काम करते हैं वे काम भी अंग्रेजी में रोमन लिपि के माध्यम से ही होता है । इस प्रकार धीरे – धीरे देवनागरी लिपि से खून का रिश्ता ही टूट जाता है।

मेरा यह विचार है कि देवनागरी लिपि के लिए ही नहीं किसी भी बच्चे के स्वभाविक विकास के लिए भी यह आवश्यक होना चाहिए कि बच्चा जब स्कूल में जाए तो उसका प्रथम साक्षात्कार मातृ भाषा और मातृभाषा की लिपि से हो , भले ही स्कूल हिंदी माध्यम का हो या अंग्रेजी माध्यम का । प्रारंभिक स्तर पर उस पर कोई अन्य भाषा या लिपि लादी नहीं जानी चाहिए । तभी न केवल उसका उसका स्वभाविक विकास होगा और वह अपनी मातृभाषा को देवनागरी लिपि को भलीभांति पढ़ और लिख सकेगा। यहां इस बात का उल्लेख करना भी आवश्यक है कि भारत में देवनागरी लिपि के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं की लिपियों की पद्धति भी लगभग पूरी तरह देवनागरी की तरह ही है । इसलिए जिन बच्चों को देवनागरी से अलग अपनी मातृभाषा की लिपियों में लिखने का अभ्यास होगा वे भी देवनागरी लिपि सीखने में अधिक समय नहीं लगाएंगे ।

देवनागरी लिपि में समय और स्थान के साथ निरंतर होते परिवर्तनों ने भी इसके प्रयोग में बाधाएँ उत्पन्न की हैं। स्वतंत्रता के पूर्व और उसके पश्चात लंबे समय तक भी विभिन्न राज्यों में देवनागरी लिपि में कई अक्षरों तथा लिपि चिह्न आदि को लेकर विभिन्न रूप प्रचलित रहे हैं। देवनागरी लिपि को सरल बनाने और उसे राष्ट्रीय लिपि के तौर पर विकसित करने के लिए भी उसमें निरंतर परिवर्तन होते रहे हैं। यही नहीं विभिन्न राज्यों में देवनागरी लिपि के कई अक्षरों या उच्चारण के अलग-अलग रूप प्रयुक्त होने से भी प्रयोक्ताओं में अक्सर भ्रम की स्थिति बनी रहती है। पिछले दिनों मेरा नेपाल में जाना हुआ तो मैंने वहां देखा कि वहां अभी भी काफी हद तक देवनागरी लिपि के कई लिपि चिह्न प्राचीन रूप में प्रचलित हैं जिन्हे हम काफी पहले पीछे छोड़ चुके हैं।

फिर मानकीकरण को लेकर भी देश में अक्सर भ्रम की स्थिति बनी रही है । भारत सरकार के स्तर पर भी अलग-अलग संस्थाओं द्वारा मानकीकरण का कार्य किया जा रहा है जहां एक और ‘केंद्रीय हिंदी निदेशालय’ मानकीकरण के कार्य में लगा रहा है और देवनागरी लिपि को विभिन्न परिवर्तनों के साथ मानक रूप देता रहा है, वहीं भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा भी देवनागरी लिपि के मानकीकरण का कार्य किया गया है । इससे भी भ्रम की स्थिति बन जाती है कि किसे मानक माना जाए। इन तमाम कारणों से देवनागरी में लिखने वाले लोगों को विशेष कर विद्यार्थियों को बहुत ही कठिनाई होती है। उन्हें अक्सर यह समझ नहीं आता कि अगर ‘हिंदी’ शब्द ही लिखना है तो वह बिंदु लगाकर लिखा जाएगी या आधा न लगाकर ‘हिन्दी’ यदि आप इस संबंध में किसी सामान्य विद्यार्थी या व्यक्ति से पूछेंगे तो वह ठीक से कोई जवाब नहीं दे सकेगा।

हालांकि सरलता के लिए किए जा रहे इन परिवर्तनों को लेकर भी देश के विभिन्न विद्वानों में पर्याप्त मतभेद रहे हैं। ऐसे अनेक विद्वान हैं जो कथित सरलता के लिए देवनागरी लिपि के वैज्ञानिक स्वरुप को नष्ट किए जाने के पक्ष में नहीं है। इसके अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाएं भी सरकार द्वारा निर्धारित मानकीकरण के स्वरूप से अलग मनमाने ढंग से देवनागरी लिपि को अपने तरीके से लिखती रही हैं। जैसे कि कई पत्र- पत्रिकाएँ रोमन लिपि की तर्ज पर पूर्ण विराम के लिए बिंदु का प्रयोग करते हैं। इस अराजकता को दूर किए जाने की आवश्यकता है।

क्योंकि देवनागरी लिपि भारत और नेपाल सहित देश के विभिन्न राज्यों में विभिन्न भाषाओं के लिए प्रयोग में लाई जाती है इसलिए यहां यह अति आवश्यक हो जाता है कि सभी स्थानों पर देवनागरी लिपि की एकरूपता बनी रहे। सरलता या किसी ने प्रद्योगिकी संबंधित कारण से यदि देवनागरी लिपि के मानक स्वरूप में कोई परिवर्तन किया जाना है तो देवनागरी लिपि का प्रयोग करने वाली भाषाओं के सभी राज्यों तथा विभिन्न भाषा विज्ञान के विद्वानों के स्तर पर व्यापक चर्चा और विचार विमर्श करने और आम सहमति बनाने के बाद किसी एक केंद्रीय संस्था द्वारा इस प्रकार के परिवर्तन किए जाने चाहिए ताकि उसे पूरे देश में ही नहीं नेपाल जैसे पड़ोसी देश में जहां देवनागरी लिपि का प्रयोग होता है वहां पर भी मान्यता मिल सके और देवनागरी लिपि का स्वरूप सभी जगह एक जैसा बना रहे । इससे देवनागरी लिपि का प्रयोग करने वालों में भ्रम की स्थिति नहीं रहेगी और एकरूपता के चलते प्रयोग में सुविधा भी होगी।

अंको के मानक स्वरूप को लेकर भी संघ सरकार और राज्यों के स्तर पर एकरूपता का अभाव है। जहां एक और संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार केंद्र सरकार के स्तर पर हिंदी में देवनागरी लिपि के लिए भारतीय अंको के अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप को स्वीकार किया गया है जो वर्तमान रोमन लिपि में उपलब्ध है। लेकिन वहीं विभिन्न राज्यों में स्थित विद्यालयों – विश्वविद्यालयों में हिंदी विषय के अंतर्गत भी अभी भी देवनागिरी के पूर्व प्रचलित अंको का ही प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार मराठी, कोकणी आदि सहित विभिन्न भाषाएं जो देवनागरी में लिखी जाती हैं उनमें भी देवनागरी लिपि के पूर्व प्रचलित अंको का प्रयोग किया जा रहा है। इसलिए यहां आवश्यक है कि यदि हिंदी संघ की राजभाषा है और संघ के अंतर्गत सभी राज्य आते हैं तो संघ के स्तर पर इस संबंध में निर्णय लेकर सभी राज्यों आदि में भी अंकों के स्वरूप में एकरूपता लाई जानी आवश्यक है।

यह भी कि हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए केंद्रीय स्तर से लेकर राज्यों के स्तर पर जो संस्थाएँ यानी अकादमियाँ आदि बनाई गई जिन्हें हिंदी में हिंदी साहित्य अकादमी का नाम दिया गया है । यह एक विडंबना ही रही कि ऐसी ज्यादातर अकादमियां अपने को केवल ललित साहित्य यानी कहानी- कविता आदि तक सीमित रखे हुई हैं। इनके लिए भाषा का अभिप्राय केवल साहित्य और साहित्य का अभिप्राय केवल ललित साहित्य तक ही सीमित है । यहां तक कि इनमें देवनागरी लिपि को आगे बढ़ाने के लिए भी कोई विशेष रुचि नहीं दिखाई देती। आज जबकि हिंदी के प्रचार – प्रसार के लिए भाषा प्रौद्योगिकी आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। प्रौद्योगिकी से तो इनका दूर-दूर तक का संबंध दिखाई नहीं देता। इसलिए इन हिंदी अकादमियों से जो अपेक्षा की गई थी भाषा और लिपि के स्तर पर वैसा नहीं कर पा रही हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि इन अकादमियों में ऐसे विद्वानों को शामिल किया जाए जो भाषा को केवल ललित साहित्य तक सीमित न करते हुए भाषा, साहित्य और लिपि सहित हिंदी के सर्वांगीण विकास के लिए कार्य कर सकें।

यदि पीछे मुड़ कर देखें तो पाते हैं कि भाषा – प्रौद्योगिकी की अपेक्षित प्रगति के अभाव में देवनागरी लिपि प्रचलन के स्तर पर अपेक्षित प्रगति नहीं कर सकी। हम प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पिछड़ते रहे और हर बहुत देर से अंग्रेजी का अनुसरण करते हुए भाषा संबंधी प्रौद्योगिकी का विकास किया। जब भारत में अंग्रेजी में कामकाज के लिए टाइपराइटर आया तो उस समय हिंदी के लिए देवनागरी टाइपराइटर उपलब्ध नहीं था। आगे चलकर हमने देवनागरी लिपि के लिए टाइपराइटर बनाया और हिंदी में काम होने लगा। इस बीच इलेक्ट्रॉनिक टाइपराइटर भी मैदान में उतर कर आ गया। जब तक हम इस बारे में सोचते और इलेक्ट्रॉनिक टाइपराइटर बनाते तब तक कंप्यूटर रुपी महा शक्ति हमारे बीच आ चुकी थी। और देखते ही देखते भाषा संबंधी लगभग सारा कार्य कंप्यूटर के माध्यम से होने लगा । एक बार फिर हम देवनागरी लिपि में कार्य करने में स्वयं को असहाय सा महसूस कर रहे थे। कुछ दिनों बाद ही हमारे यहां इस दिशा में कुछ कार्य हुआ । आई. आई. टी कानपुर और सीडैक पुणे आदि देश की प्रतिष्ठित संस्थाओं ने इसके लिए कुछ इस प्रकार की व्यवस्था की जिससे की विशेष तौर पर बनाए गए भाषा सॉफ्टवेयरों के माध्यम से कंप्यूटर पर हिंदी में देवनागरी लिपि में काम किया जा सकता था। आगे चलकर अनेक निजी कंपनियों ने भी अक्षर, आकृति, एपीएस जैसे इस प्रकार के सॉफ्टवेयर बनाए। लेकिन तब भी हमारी उड़ान बहुत ही सीमित थी । हिंदी सहित भारतीय भाषाओं के लिए यूनिकोड एनकोडिंग फॉंट्स नहीं बने थे। देवनागरी लिपि में कार्य केवल उसी कंप्यूटर पर हो सकता था जिस पर उस विशेष तरह के सॉफ्टवेयर को लगाया जाए, जो कि काफी महंगा आता था। एक सरकारी कार्यालय में ही सैकड़ों कंप्यूटर होते हैं ऐसे में सभी कंप्यूटरों के लिए ऐसी सॉफ्टवेयर खरीदना संभव न था। उस दौर में कुछ केंद्रीय सरकार के कार्यालयों द्वारा ही ऐसे कुछ सॉफ्टवेयर लेकर हिंदी में कार्य करना प्रारंभ किया गया। समाचार पत्रों और मुद्रण कार्य से जुड़े व्यवसाइयों ने भी आवश्यकतानुसार इसका प्रयोग किया। लेकिन आम आदमी के लिए यह तब भी आसान न था क्योंकि इतने महंगे सॉफ्टवेयर अपने व्यक्तिगत कार्य के लिए खरीद कर प्रयोग में लाना आम आदमी के बूते की बात तो थी नहीं । इन तमाम कारणों से धीरे-धीरे हिंदी को रोमन लिपि में लिखने की परंपराएं आगे बढ़ती रही।

लंबे समय तक हम इस प्रतीक्षा में लगे रहे कि भारतीय भाषाओं के लिए अंग्रेजी की तरह कब यूनिकोड यानी यूनिवर्सल एनकॉर्डिंग की व्यवस्था होगी।आखिर वह समय भी आया जब हिंदी सहित तमाम भारतीय भाषाओं की लिपियों को लिखने के लिए यूनिकोड की व्यवस्था हो गई और हम सभी के कंप्यूटरों में तमाम भारतीय भाषाओं को उनके लिपियों में लिखने के लिए यूनिकोड मंगल फोंट्स ही नहीं बल्कि उन्हें लिखने के लिए अति वैज्ञानिक और सरल इंस्क्रिप्ट कुंजीपटल भी उपलब्ध करवा दिया गया। अब यह सुविधा केवल कंप्यूटर माइक्रोसॉफ्ट वर्ड के लिए ही नहीं बल्कि एक्सल, पावर पॉइंट आदि अन्य सभी प्रकार के कार्यों के लिए उपलब्ध हो गई थी। यानी कोई भी व्यक्ति बिना कुछ भी खर्च किए अपने किसी भी कंप्यूटर पर कोई भी कार्य बड़ी आसानी से देवनागरी लिपि में कर सकता था। यही नहीं अब तक इंटरनेट पर जो पाठ्य सामग्री कचरे सी बन कर पहुंचती थी अब यूनिकोड फॉंट्स की मदद से ज्यों की त्यों विश्व भर में पहुंच सकती थी, जो कि सभी कंप्यूटरों पर पहले से उपलब्ध थे आवश्यकता थी तो केवल अपनी भाषा को सक्रिय करने कीजो कि दो -चार मिनिट का सरल सा काम था।

आज जबकि देश – दुनिया में पुस्तकें पढ़ने और कलम से लिखने का प्रचलन लगातार कम होता जा रहा है और युवा पीढ़ी ज्यादातर कागज पर लिखने के बजाए कंप्यूटर और मोबाइल पर ज्यादा लिख रही है। विचारों का और सूचनाओं का आदान-प्रदान ज्यादा से ज्यादा सोशल मीडिया के माध्यम से हो रहा है। ज्ञान – विज्ञान और सूचना ही नहीं, साहित्य भी अब इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए देश दुनिया में विस्तार पा रहा है। ऐसे में भी यदि हिंदी केवल कलम तक सिमट कर रह जाए और प्रौद्योगिकी के पंखों से इंटरनेट के अनंत क्षेत्रों पर उड़ान न भर पाए तो हम दुनिया की अन्य भाषाओं के मुकाबले आगे कैसे बढ़ पाएंगे ? इसके लिए आवश्यक है कि हम देवनागरी लिपि को प्रौद्योगिकी से लैस कर डिजिटल युग के साथ आगे बढ़ाएँ । अगर हमें बदलते समय के साथ आगे बढ़ती हुई विश्व की श्रेष्ठतम और अत्यधिक वैज्ञानिक लिपि को आगे लेकर जाना है तो नए दौर के तौर तरीकों को भी अपनाना होगा। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि देवनागरी लिपि को इंटरनेट के माध्यम से आगे पहुंचाने के लिए आधुनिकतम प्रौद्योगिकी को अपनाने और अपने विद्यार्थियों तक पहुंचाने के लिए शिक्षण -प्रशिक्षण और परीक्षा-व्यवस्था में शामिल करने जैसे तमाम उपाय किए जाएँ।

लेकिन समस्या मात्र उपकरण नहीं थी समस्या तो थी इच्छाशक्ति । देवनागरी लिपि के लिए भाषा-प्रौद्योगिकी की सभी सुविधाएँ उपलब्ध होने पर भी जहां देश के तमाम विद्यालय और विश्वविद्यालय अंग्रेजी में काम करने के लिए या सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से काम करने के लिए रोमन लिपि का कीबोर्ड बताते, सिखाते और उपयोग में लाते रहे। वही हमारे भाषा शिक्षण विभाग और सूचना प्रौद्योगिकी शिक्षण विभाग पूरी तरह इस तरफ उदासीन बने रहे। न केवल उदासीन बने रहे बल्कि अभी तक भी उदासीन होकर बैठे हैं । ऐसा लगता है कि हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में कंप्यूटर या मोबाइल आदि पर काम करने की जानकारी देना उन का दायित्व नहीं है । शायद यह कार्य भी विदेशियों को कर ही करना होगा ? जब देश के तमाम विद्यालय और विश्वविद्यालय कंप्यूटर मोबाइल आदि तमाम उपकरणों पर देवनागरी लिपि में कार्य की जानकारी ही नहीं दे रहे और इन उपकरणों को अंग्रेजी का मानते हुए केवल रोमन लिपि में ही कार्य करने का प्रशिक्षण देंगं तो देवनागरी लिपि का प्रयोग कैसे बढ़ सकता है। यदि सरकारी स्तर पर इस संबंध में कोई प्रयास किया गया है तो वह केवल केंद्र सरकार के कार्यालयों में हिंदी में कार्य करने के लिए कंप्यूटर आदि पर हिंदी में कार्य की प्रशिक्षण का है, लेकिन वह भी आटे में नमक की तरह ही है।

भारत सरकार इलेक्ट्रॉनिक विभाग के पूर्व अपर सचिव एवं भाषा प्रौद्योगिकी के वरिष्ठ विद्वान डॉ. ओंम विकास जो लंबे समय से केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के पाठ्यक्रम समिति के सदस्य रहे हैं, उनसे इस संबंध में मेरी कई बार चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि समिति द्वारा सरकार को कई बार यह सिफारिश की जा चुकी है कि विद्यार्थियों को स्कूल में ही कंप्यूटर पर कार्य के लिए सर्वमान्य तथा सर्वाधिक उपयुक्त हिंदी में कार्य करने संबंधी अति सरल इंस्क्रिप्ट कीबोर्ड का प्रशिक्षण दिया जाए । लेकिन इसके बावजूद भी अभी तक यह कार्यान्वित नहीं हो सका है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इंस्क्रिप्ट कीबोर्ड न केवल हिंदी के लिए बल्कि भारत की तमाम भारतीय भाषाओं के लिए एक समान है । यदि आपने किसी भी एक भारतीय भाषा के लिए इस कुंजीपटल को सीख लिया तो उसी के माध्यम से आप हिंदी सहित देश की किसी भी भाषा में काम कर सकते हैं। इसलिए यहां यह भी अनिवार्य नहीं है कि इसे केवल हिंदी के माध्यम से सिखाया जाए बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से विभिन्न राज्यों में इनस्क्रिप्ट की बोर्ड का प्रशिक्षण दिया जा सकता है । इस संबंध में सरकारों को बार-बार लिखे जाने के बाद भी इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड के प्रशिक्षण की व्यवस्था हमारे विद्यालयों में नहीं हुई है । जब हम उन्हें सिखाएंगे ही नहीं, उसे पाठ्यक्रम में शामिल ही नहीं करेंगे तो हम यह कैसे उम्मीद करें कि देश के लोग अपनी भाषाओं को देवनागरी या अन्य भारतीय लिपियों में टंकित करेंगे। अगर यह कार्य किया जाना है तो मानव संसाधन विकास मंत्रालय के माध्यम से सभी विद्यार्थियों को देवनागरी लिपि में कंप्यूटर पर कार्य करने का प्रशिक्षण दिया जाना होगा और इसके लिए परीक्षा की व्यवस्था भी करनी होगी ताकि विद्यार्थी इसे केवल औपचारिकता के रूप में न लेकर गंभीरता से सीखें और प्रयोग करें। भाषा – शिक्षण और परीक्षा में कुछ ऐसी सामग्री भी होनी चाहिए जिसे विद्यार्थी परीक्षा में कंप्यूटर के माध्यम से देवनागरी में में टंकित करके प्रस्तुत करें। यदि ऐसा होगा तो देश के सभी विद्यार्थी जो कल के नागरिक होंगे वे अपना समग्र कार्य देवनागरी लिपि और अन्य भारतीय लिपियों के माध्यम से करने में सक्षम हो सकेंगे।

जब माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी अनेक प्रौद्योगिकी कंपनियों ने देखा कि तमाम सुविधाएं उपलब्ध करवाने के बावजूद भी भारत में लोग अपनी भाषाओं की लिपि में कार्य नहीं कर रहे और हिंदी सहित अपनी तमाम भाषाओं को रोमन लिपि में ही लिख रहे हैं तब उन्होंने ऐसा फोनेटिक की-बोर्ड मुफ्त उपलब्ध करवाया जिनमें आप रोमन लिपि में टाइप करते हुए भी हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में पाठ्य प्राप्त कर सकते हैं। बहुत सारे केंद्रीय कार्यालयों तथा जनसामान्य द्वारा इनका प्रयोग कुछ हद तक होने लगा। इनकी मदद से इंटरनेट और सोशल मीडिया आदि पर देवनागरी लिपि प्रकट होने लगी। यह उपाय सरल तो था लेकिन कहीं न कहीं यह रोमन लिपि को ही आगे बढ़ाता हुआ दिखाई दे रहा है। हालांकि इन उपकरणों की जानकारी भी बहुत ही कम लोगों को है।

सूचना प्रौद्येगिकी तथा भाषा – प्रौद्योगिकी को अपनाने तथा प्रशिक्षण आदि की समुचित व्यवस्थाओं के न होने के कारण न केवल अंग्रेजी के लिए बल्कि हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं के लिए भी रोमन लिपि अपनाई जाने लगी । आज भी स्थिति यह है कि देश की जनसंख्या का एक बहुत बड़ा तबका जो अंग्रेजी ठीक से नहीं जानता और हिंदी बहुत अच्छी तरह लिखना – पढ़ना जानता है, फिर भी वह कंप्यूटर/ मोबाइल आदि पर हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं को रोमन लिपि में लिखता है। इसीका परिणाम यह था कि अंग्रेजी लेखक चेतन भगत ने हिंदी को बचाने के लिए रोमन लिपि को अपनाने तक की वकालत कर डाली।

प्रौद्योगिकी की गति बहुत तेज है । पिछले दो – एक साल में मोबाइल आदि में बहुत ही सरल किस्म के ऐसे अनेक की-बोर्ड आ गए हैं जिनकी मदद से बिना किसी प्रशिक्षण के भी कोई व्यक्ति देवनागरी में टंकित कर सकता है । अब तो गूगल वॉयस के रुप में ऐसी नि:शुल्क प्रौद्योगिकी भी उपलब्ध हो गई है जिसकी मदद से कोई भी व्यक्ति सरलता से बोल कर अपने मोबाइल अथवा कंप्यूटर आदि पर देवनागरी लिपि में टाइप कर सकता है।पर बात तो फिर वहीं घूम फिर कर आ जाती है कि जब इन की जानकारी आज की युवा विद्यार्थियों को भी नहीं दी जा रही तो ऐसे में अन्य लोगों से यह अपेक्षा करना कि वे इन तमाम सुविधाओं के माध्यम से अपने मोबाइल में और कंप्यूटरों पर देवनागरी लिपि में लिखने के लिए करें ,यह व्यावहारिक नहीं लगता ।

हमने बहुत समय गंवा दिया है। कंप्यूटर, मोबाइल और प्रौद्योगिकी के नए-नए उपकरणों के इस युग में यदि हमने देवनागरी लिपि के प्रयोग के लिए नवीनतम भाषा –प्रौद्योगिकी को आत्मसात करने में असफल रहे तो धीरे-धीरे देवनागरी लिपि प्रचलन से बाहर होती जाएगी। देवनागरी लिपि को राष्ट्रीय स्तर पर और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित और प्रतिष्ठित करने के लिए यह आवश्यक है कि लिपियों के लिए उपलब्ध नवीनतम प्रौद्योगिकी को अपनाते हुए और उसके लिए देश के विद्यार्थियों और जनसामान्य को जागरूक तथा तैयार करते हुए हम दनिया के साथ आगे बढ़ें।

— डॉ. एम.एल. गुप्ता ‘आदित्य’

(साभार- वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई)