कहानी

पाठक की कलम से- 3

आँखें (कहानी)
रोशनी पंद्रह-सोलह वर्षीय एक खूबसूरत लड़की तो थी ही, मगर इस से भी ज़्यादा फुर्तीली काम-काज में माहिर और गाने में सुरीली आवाज़ की मालिक थी। हर सुबह वह माँ के साथ बाबा नानक जी की फोटो के सामने खड़ी हो कर अरदास में शामिल होती, फिर वह बगीचे में जा कर फूलों को पानी देती, उन को सूँघ कर उन से बातें करती जैसे वह फूल उन की बात समझ रहे हों। फिर वह चिड़ियों को दाने खिलाती जो शायद पहले ही उस की इंतज़ार में बैठी हों और आखिर में जाती अपनी सखी गाय के पास, जिस का नाम उस ने गौरी रखा हुआ था। उस को आटे का पेड़ा खिलाती, उस के सींगों को हाथ से सहलाती। घर के सब काम बहुत अच्छे ढंग से करती। सही मायनों में वह घर की रोशनी ही तो थी।

बस एक ही बात थी, कुदरत ने उस के साथ इंसाफ नहीं किया था, वह भले ही दृष्टिबाधित थी, लेकिन उस को इस की कोई परवाह नहीं थी, भले ही उस की माँ अंदर से दुखी हो। जब वह दो महीने की थी तो चारपाई से गिर गई थी और बहुत देर बाद माँ को पता चला था कि रोशनी तो देख नहीं सकती थी. उस की खूबसरती को देख कर ही माँ ने उस का नाम रोशनी रखा था। बहुत इलाज कराया गया था लेकिन रोशनी की आँखों में रोशनी की बजाय अँधेरा ही रह गया।

बड़े भैय्या की शादी थी और रोशनी अपनी सहेली पुष्पा के साथ बैठी प्याज़ काट रही थी। प्याज़ों का टोकरा उन के पास था। वे काट रही थीं और साथ-साथ गा भी रही थीं। प्याज़ बहुत कड़वे थे और दोनों की आँखों से पानी बह रहा था और इस पर भी वे हंस रही थीं। आधा टोकरा खत्म हो गया था, तभी रोशनी को कुछ अजीब सा महसूस हुआ, कुछ धुंधला-सा दिखाई देने लगा। वह पुष्पा की तरफ देखने लगी और कुछ ही मिनटों में उसे साफ़ दिखाई देने लगा।

उस ने कमरे के चारों ओर देखा, छत पर घूमता हुआ पंखा देखा, वह उठ कर बाहर की ओर भागी। पुष्पा चिल्लाई,” रोशनी क्या कर रही हो? धीरे चल, गिर जायेगी “. बाहर निकल कर रोशनी ने आसमान की तरफ देखा, इर्द-गिर्द के मकानों की ओर देखा। फिर वह बगीचे की तरफ चली गई, एक-एक फूल को ध्यान से देखने और उन से बातें करने लगी,” ओह ! तो तुम ऐसे हो, तू कौन सा रंग है, अरे तू कितना खूबसूरत रंग है, तेरा क्या रंग है ?” बातें करती-करती भूल ही गई कि उस ने तो प्याज़ काटने थे।

आँगन के पेड़ पर बैठी चिड़ियों की ओर देखने लगी। उन की आवाज़ से ही उस को पता चल गया कि जिन को इतने वर्षों से दाने डालती आई थी, वे ऐसी थीं। रोशनी चिड़ियों को ध्यान से देखने लगी और उन से बातें करने लगी।

अब उस को याद आया अपनी सखी गौरी का। गाय की तरफ गई और उस को देखती ही रही। गौरी ने रोशनी की तरफ देखा, जैसे उस को पता चल गया हो कि रोशनी अब उसे देख सकती है। रोशनी गौरी के गले लिपट गई, उस के मुंह पर अपने हाथ चलाने लगी।

अचानक माँ आ गई और और बोली, ” अरे रोशनी तू यहां क्या कर रही है? पुष्पा अकेले ही प्याज़ काट रही है, जा जा कर उस का हाथ बंटा “.

रोशनी ने माँ की तरफ देखा, और फिर माँ के मुंह को अपने हाथों से सहलाने लगी।

” यह क्या कर रही हो रोशनी ?”. माँ ने डांटा। रोशनी ने माँ के कपड़ों पर छपे फूलों की ओर देखा और एक दम माँ के गले लिपट गई और ऊंची-ऊंची रोने लगी। रोशनी के पिता, भैय्या और पुष्पा भी आ गए थे। रोशनी रोये जा रही थी और बोलती जा रही थी,” ओह माँ, मुझे दिखाई देने लगा है, ओह माँ, आँखें ऐसी होती हैं? यह तो मुझे आज पता चला, मैं तो अँधेरे में ही जीती रही, ओह माँ, स्वर्ग यहां ही है, और कहीं नहीं। माँ ! मेरे मरने के बाद मेरी आँखें दान कर दो ताकि किसी को रोशनी मिल जाए। “.

“मरें तेरे दुश्मन,” अब माँ भी हैरान हुई बोलने लगी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जो रोशनी बोल रही थी वह सच था। रोशनी भीतर जा कर बाबा नानक देव जी की तस्वीर के सामने जा खड़ी हुई और हाथ जोड़ कर बाबा जी का धन्यवाद करने लगी। रोशनी के पीछे सभी लोग हाथ जोड़ कर खड़े थे।

-गुरमेल भमरा

गुरमेल भमरा के फेसबुक से साभार

जय विजय में गुरमेल भमरा का ब्लॉग-
http://jayvijay.co/author/gurmailbhamra/

‘जय विजय’ में गुरमेल भमरा का संक्षिप्त परिचय-
१९६२ में इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले18 वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. दस वर्ष से रेडियो एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. ‘जय विजय’ के लिए लघु कथाएँ, संस्मरण व ब्लॉग्स लिख रहे हैं. ‘जय विजय’ से जुड़ते ही उन्हें 2015 में उत्कृष्ट साहित्यिक सेवाओं के लिए ‘जय विजय’ रचनाकार सम्मान प्रदान किया गया.

गुरमेल भमरा पर हमारे अनेक ब्लॉग्स आए हैं. उन ब्लॉग्स पर हमने दो ई.बुक्स बनाई हैं, जिनके लिंक इस प्रकार हैं-
गिनेस वर्ल्ड रिकॉर्ड से ऊंची, आपकी ऊंचाई:गुरमैल भाई भाग 1

https://issuu.com/shiprajan/docs/gurmail_bhai_ebook

गिनेस वर्ल्ड रिकॉर्ड से ऊंची, आपकी ऊंचाई:गुरमैल भाई भाग 2

इसके अतिरिक्त उनकी आत्मकथा के 201 भाग जय विजय में मेरी कहानी नाम से प्रकाशित हुई हैं, हमने उसकी 9 ई.बुक्स बना दी हैं, जिनका लिंक इस प्रकार है-


आजकल गुरमैल भाई जी अनेक साहित्यिक मंचों से जुड़े हुए हैं. वे सबसे पहले ‘साहित्य प्रहरी’ मंच से जुड़े । वहाँ उनकी आत्मकथा के साथ ही समय-समय पर अन्य रचनाएँ भी बहुत सराही गईं ! 2018 में ‘अनुपम हिंदी साहित्य’ मंच से जुड़े और वहाँ भी उनकी आत्मकथा ने सफलता के नए आयाम स्थापित किये । अप्रैल 2019 में सार्थक साहित्य मंच से भी जुड़े और उन्होंने पूरी आत्मकथा यहां फिर से पोस्ट की. यहाँ भी उनकी आत्मकथा बेहद सराही गई. नया लेखन – नए दस्तखत तथा सार्थक साहित्य मंच पर वे सक्रिय रहते हैं. फेसबुक पर वे अपनी आत्मकथा ‘मेरी कहानी’ के 170 भाग हिंदी व पंजाबी में प्रकाशित कर चुके हैं. ‘मेरी कहानी’ के हर एपिसोड का पाठक बड़ी बेसब्री से प्रतीक्षा करते हैं, प्रकाशित होते ही देश-विदेश से लाजवाब प्रतिक्रियाएं आनी शुरु हो जाती हैं. ‘मेरी कहानी’ जैसी आत्मकथा हमने पहले कभी नहीं पढ़ी. गुरमैल भाई के उत्तम स्वास्थ्य व दीर्घायु के लिए हमारी कोटिशः हार्दिक शुभकामनाएं.

 

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

6 thoughts on “पाठक की कलम से- 3

  1. लीला बहन , यह आप का और विजय भाई, दोनो का बड़ापन है जो आप दोनों ने मिल कर मुझे साहित जगत में परवेश करने का अवसर दिया, नहीं तो मैं आज गुमनाम जिंदगी जी रहा होता . बहुत बहुत धन्यवाद जी .

    1. प्रिय गुरमैल भाई जी, आप श्रेय भले ही किसी को भी दे दीजिए, पर यह आपकी लगन, मेहनत और प्रतिभा का परिणाम है, कि आप इस ऊंची मंजिल तक पहुंच सके हैं. प्रभु अपनी कृपा बनाए रखें. ब्लॉग का संज्ञान लेने, इतने त्वरित, सार्थक व हार्दिक कामेंट के लिए हृदय से शुक्रिया और धन्यवाद.

  2. बहुत अच्छी कहानी बहिन जी ! यह कहानी जय विजय में लघुकथा ‘रौशनी’ के रूप में नवम्बर 2018 में छप चुकी है।
    इसमें कोई शक नहीं कि प्याज आँखों को बहुत लाभ पहुँचाता है। इस तरह की एक और कहानी बल्कि आत्मकथा मैंने कहीं पढ़ी थी। मैं भी जब कभी प्याज काटता हूँ तो आँखों में जलन होती है। जिसके बाद मुझे बहुत अच्छा लगता है। इस विषय पर एक लेख लिखने की सोच रहा हूँ।

    1. प्रिय विजय भाई जी, सचमुच ऐसे किस्से-कहानियां पढ़कर मन बहुत खुश होता है और सकारात्मकता आ जाती है. आप इस विषय पर अवश्य लेख लिखिए. सपने बहुत आने पर भी कोई लेख लिखिए, अगर पहले ही कोई लेख हो तो कृपया उसका लिंक भेजने का कष्ट करें. ब्लॉग का संज्ञान लेने, इतने त्वरित, सार्थक व हार्दिक कामेंट के लिए हृदय से शुक्रिया और धन्यवाद.

  3. क्या प्याज के रस से आंखों की रोशनी वापिस आ सकती है?

    खाने में तड़का लगाना हो या सलाद बनाना हो प्याज के बिना कुछ भी स्वाद नही लगता हैं। प्याज काटते समय चाहे आंखों में पानी आने के कारण आप इसे काटने या प्रयोग करने से मना करता होगें लेकिन प्याज काटने से आंखों में से जितना पानी निकलता है उतने ही इसके फायदे होते है। प्याज न केवल गर्मी में लू लगने से ही नही बचाता है इससे हमारे शरीर को कई तरह के फायदे भी मिलते है। चलिए बताते है आपको कि दिन में एक बार प्याज खाने से आपको क्या फायदे हो सकते हैंं।
    प्याज काटते समय आंखों से जितना पानी निकलता है आपकी आंखों की रोशनी उतनी अच्छी रहती हैं। इतना ही नही प्याज खाने से शरीर में ग्लूटाथिओन का निर्माण होता है जो कि काला व सफेद मोतियाबिंद आदि समस्याओं से बचाता है। इसके अलावा डायबिटीज,कैंसर, पाचन तंत्र, मजबूत हड्डियां, सूजन व एलर्जी, रोग प्रतिरोधक प्रणाली. मुंह की बदबू, कान में दर्द के लिए प्याज फायदेमंद है.

  4. प्रिय गुरमैल भाई जी, जब से हमने आपकी यह कहानी पढ़ी है, हमारा प्याज काटने का नजरिया बदल गया है. पहले लगता था, आंखों में मिचमिचाहट हो रही है, अब लगता है हमारी आंखों की रोशनी बढ़ रही है. वैसे भी हम हमेशा से यह मानते आ रहे हैं, कि नजर बदलो, नजारे बदल जाएंगे – सोच बदलो, सितारे बदल जाएंगे. यह होता है एक अच्छी साहित्यिक रचना का प्रभाव.\! इतनी खूबसूरत कहानी लिखने के लिए आप बधाई के पात्र हैं. अपना ब्लॉग की तरफ से बधाई स्वीकार कीजिए. आप प्रतिक्रियाओं की चिंता मत कीजिएगा, हम सबको उत्तर दे देंगे. आप अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखिएगा.

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