गीतिका/ग़ज़ल

गजल

लगती है रुखसार से वो मुझको नूरी सी
जिस्म को सांसे है वैसे ही वो जरूरी सी

उसको खोजता फिरता हूँ इस जमाने में
मगर वो तो बसती है मुझमें कस्तूरी सी

उसके अहसास से खिल उठती है मेरी
ये जिंदगी जो अधूरी है होकर पूरी सी

उसके बिन हालत ऐसी हो जाती मेरी
लगती है ख़ुद से ही मुझको दूरी सी

उसकी तारीफ क्या बोलके मैं कर दूँ
चाँद में स्याह दाग और वो है भूरी सी

जो मिला मुझको बहुत को नशीब नही
पर बेचैन करती है ख्वाहिशें अधूरी सी

सोचता हूँ उसके बारे में न सोचूँ कुछ
मगर उसकी यादे बन गई मजबूरी सी

ऐसा रूप रति रंभा उर्वसी फीके लगे
वो सिर से पाँ तलक लगती अंगूरी सी

कहाँ ऋषभ मुफलिसी की भटकन है
और कहाँ वो है राजसी मगरूरी सी

— ऋषभ तोमर

ऋषभ तोमर

अम्बाह मुरैना