संस्मरण

बेबस्सी

                  सोमवार 21 स्तंबर का दिन, धूप और अपने हरिआली भरे गार्डन में बैठ कर मज़ा करना, इंग्लैंड में कभी कभी ही ऐसा दिन नसीब होता है। मौसम विभाग की जानकारी के मुताबक 21 और 22 स्तंबर को दिन बहुत अच्छा बताया गया था और आज 25 स्तंबर है और वाकई 23 सतंबर से ठंड शुरू हो गई है और धीमी धीमी बारिश भी हो रही है। उस दिन सोमवार 21 सतंबर को भी हम अपने गार्डन में बैठे धूप का मज़ा ले रहे थे। हर रोज़ तीन वजे हम चाय पीते हैं। चाय के साथ हर रोज़ कुछ मज़े की चीज़ खाते हैं। सोमवार को जब तीन वज गए तो अर्धांगिनी साहिबा पूछने लगी कि चाय के साथ किया खाना है। मैंने कहा, आज हल्का सा खाने को ही मन करता है। हम दोनों किचन में आ गए. अर्धांगिनी साहिबा ने चाय के लिए पानी की कैटल ऑन कर दी और साथ ही चीज़ सैंडविच बना दिया। अपनी कुर्सी पर बैठ कर मैंने अभी सैंडविच को हाथ ही लगाया था कि पत्नी खड़ी खड़ी बर्तन धोने वाले पानी के सिंक में उलटी करने लगी और नीचे गिर गई। घबरा कर मैं अपनी कुर्सी से उठा। जब तक हिमत करके पत्नी उठने की कोशिश करने लगी। क्योंकि मैं डिसेबल हूँ और रेहड़ी के साथ चलता हूँ, मैंने उठ कर रेहड़ी को अभी हाथ ही लगाया था कि पत्नी थोड़ी उठ कर फिर से गिरने लगी। गिरने से बचाने की खातर मैंने पत्नी की कलाई तो पकड़ ली लेकिन वोह फिर से फ्लोर पर गिर गई और साथ ही मैं भी गिर गया। क्योंकि मैं मोटर न्यूरोन डीज़ीज़ से पीड़त हूँ और शरीर में कोई शक्ति न होने के कारण, उठने में असमर्थ था और उधर पत्नी नीचे गिरी पढ़ी थी। मुझे खौफ सता रहा था कि पत्नी को हार्ट अटैक हो गया है। उस को खुद नहीं पता था कि वोह कहाँ है और मेरा तो उस को कुछ भी पता नहीं था। इधर मैं उठने की लगातार कोशिश कर रहा था, जोर लगा रहा था। कभी कुर्सी को पकड़ता, कभी किचन कैबनेट को पकड़  कर उठने को कोशिश करता लेकिन कुछ बन नहीं पा रहा था, चिल्लाने की हिमत नहीं थी मुझ में। टेलीफून पर पहुंचना तो दूर की बात थी। तभी पत्नी ने पता नहीं कैसे कुछ हिमत की और टेलीफून तक पहुँच गयी। बच्चों को टेलीफून पे इतना ही कहा,  ”  तुम्हारा डैड नीचे गिर …. ” और वोह फिर से गिर गई। बेटे को कुछ समझ में नहीं आया और वोह गाड़ी तेज चला के पांच मिंट में ही आ गया। जब तक पत्नी साहिबा उठ खड़ी हुई थी और उठ कर सिंक में फिर से उलटी कर रही थी। बेटे ने मम को ठीक देख कर मुझे उठाने की कोशिश की लेकिन मेरे जैसे भारी भरकम शरीर को उठाना उस से मुश्किल हो रहा था। तभी पांच मिंट बाद बहु, दोनों पोतों को ले कर आ गयी। अब बेटे और दोनों पोतों ने बड़ी मुश्किल से मुझे उठाया और सोफे पर बिठा कर पानी दिया। मेरा भी बहुत जोर लग्ग गया था और पसीने से भीगा हुआ था। पत्नी साहिबा अब बिलकुल ठीक थी। दरअसल कभी कभी वोह दिन के वक्त रोस्ट किया हुआ आलू खाती है। उस दिन भी उस ने आलू ही खाया था लेकिन कोई एक घंटे बाद उस ने थोड़े से स्लाइस पपीते के खा लिए। उस के बाद ही उस का दिल मिचलाने लगा, सर को गैस चढ़ कर चकर आ गया था। उलटी आने के कुछ मिंट बाद वोह ठीक हो गयी।
                                यह भी भाग्य ही था की करोना वायरस के कारण बेटा और बहु दोनों घर से ही काम करते हैं। मुझे कुछ चोटें लगीं और पत्नी साहिबा को भी लेकिन इतनी सीरीयस नहीं। दोनों पेन किलर ले रहे हैं और पहले से कहीं बेहतर हैं। उम्मीद है, एक हफ्ते में यह कल की बात हो जायेगी मगर सवाल तो यह है कि इंसान का किया भरोसा ! अगर पत्नी उठ नहीं पाती और इधर मैं भी उठ नहीं पाता तो किया होता ! ऐसी बेब्स्सी की हालत में कोई किया कर सकता है, इस बात को कोई नहीं समझ सकता मगर किया इस को याद कर कर के डरते रहें ! नहीं, मन को मज़बूत करके आगे बढ़ना ही सही है। हमारे जैसे बूढ़ों को यह सोचना भी जरूरी है कि जो हमारे साथ हुआ है, किसी के साथ भी हो सकता है, इस लिए ऐसी स्थिति के बारे में सोच कर कुछ इंतज़ाम  जरूर करना चाहिए। हम ने अब यह सोचा है कि जब बच्चे काम पर जाने लगेंगे, इस के बारे में कोई इंतज़ाम जरूर करेंगे। इंग्लैंड मे इंशोरेंस हो जाती है। गले में या कलाई पर घड़ी जैसी गैजेट बाँध लेते हैं और बिपता के वक्त इस का बटन दबा देते हैं और इंशोरेंस वाले उसी वक्त समझ जाते हैं कि किस घर से एमरजेंसी मैसेज आया है और वोह कुछ मिनटों में ही खुद दरवाज़ा खोल कर अंदर आ जाते हैं और उठा कर उस को फर्स्ट एड दे कर देखते हैं कि अगर चोटें गहरी हैं तो हस्पताल भेजने के लिए ऐम्बूलैंस बुला लेते हैं। भारत में, वैसे तो हर दम लोग आस पास रहते ही हैं लेकिन अगर कोई अकेले में अंदर ही रह रहा हो तो उस के लिए जरूर कुछ सोचना चाहिए।
गुरमेल भमरा 

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.

2 thoughts on “बेबस्सी

  1. प्रिय गुरमैल भाई जी, आप धन्य हैं. आपका साहसकाबिलेतारीफ है. प्रभु की अपार कृपा से आप इतने बड़े हादसे से उबर गए. इसे कहते हैं, जाको राखे साइयां—. आपने बिलकुल दुरुस्त फरमाया है. एहतियात तो रखनी ही पड़ेगी. यह भी अच्छा है, कि इंग्लैंड मे इंशोरेंस की सुविधा है और सहायता तुरंत मिल जाती है. ऑस्ट्रेलिया में भी ऐसा ही है. भाई, ध्यार रखिए. स्वस्थ और सुरक्षित रहिए. अपनी आपबीती लिखकर सबको जागरूक करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया.

    1. बहुत बहुत धन्यवाद लीला बहन . भगवान् की कृपा से हम बच गए लेकिन आगे के लिए हम बहुत धियान रखेंगे .

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