राजनीति

सुप्रीम कोर्ट का राज्य सरकारों को महत्वपूर्ण निर्देश

कोरोना वाइरस संक्रमित मरीजों के लिए उचित एम्बुलेंस शुल्क तय करें
*गोंदिया* – सुप्रीम कोर्ट द्वारा शुक्रवार दिनांक *11 सितंबर 2020 को जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी व जस्टिस एम आर शाह की पीठ ने कोरोना वाइरस संक्रमित मरीजों के लिए उचित एम्बुलेंस शुल्क के संबंध में महत्वपूर्ण निर्देश दिए*। कोरोनावायरस महामारी के बीच कोविड-19 के मरीजों को सेवा देने के लिए एंबुलेंस सेवाओं की ओर से ज्यादा शुल्क मांगने पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है. सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को एंबुलेंस सेवाओं के लिए उचित मूल्य तय करने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने कहा है कि राज्य महामारी से निपटने के लिए केंद्र की ओर से जारी की गई एडवाइजरी से बंधे हुए हैं और सभी राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोविड रोगियों को अस्पताल ले जाने के लिए प्रत्येक जिले में पर्याप्त संख्या में एंबुलेंस उपलब्ध कराए जाएं। *मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस संबंध में एक हलफनामा दायर किया गया है और एक स्टैंडर्ड ऑफ प्रोसिज़र (SoP) जारी की गई है*। हलफनामे में कहा गया है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने एक आपातकालीन प्रतिक्रिया योजना तैयार की है और एक SOP भी जारी किया है। अदालत ने कहा कि Covid-19 के मरीजों के परिवहन के लिए SoP को भी निर्धारित किया गया है और इसमें सभी राज्यों को विस्तृत विवरण जारी करने का उल्लेख है। इसमें कहा गया है कि 29 मार्च, 2020 को जारी SoP का राज्यों द्वारा पालन जरूरी है  और एंबुलेंस उपलब्ध कराई जानी चाहिए और मदद को जरूरतमंद व्यक्तियों को बढ़ाया जाना चाहिए, जिन्हें अस्पताल ले जाया जाना आवश्यक है। याचिकाकर्ता के वकील ने बताया  कि दिशा-निर्देश एंबुलेंस के शुल्क को निर्धारित नहीं करते हैं। अदालत ने कहा कि ‘हम निर्देश देते हैं कि राज्य सरकार उचित शुल्क तय करेगी।’ *कोर्ट ने उस याचिका का भी निपटारा किया, जिसमें कोरोना को देखते हुए एंबुलेंस सुविधा समेत अन्य उपाय करने के लिए दिशा- निर्देश मांगे गए थे।* बता दें कि इस समय भारत समेत दुनिया के तमाम देश कोरोना वायरस की विभीषिका का सामना कर रहे हैं. भारत में कोरोना के कारण हुए लॉकडाउन को छह महीने से ज्यादा का वक्त हो चुका हैं. देश में कोरोना वायरस के फैलते संक्रमण के कारण स्वास्थ्य सेवाओं पर बहुत दबाव है. देश के कई हिस्सों में कोरोना संक्रमित मरीजों से इलाज के नाम पर लोग ज्यादा पैसे वसूलने की भी खबरें सामने आयी, अब इसी आज बीच सुप्रीम कोर्ट ने अस्पताल में एंबुलेंस के किराए को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। *सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि कोविड-19 मरीजों के लिए एंबुलेंस सेवाओं के लिए उचिक रेट फिक्स किए जाएं. कोर्ट ने कोविड-19 के मरीजों को सेवा देने के लिए एंबुलेंस सेवाओं की ओर से ज्यादा शुल्क मांगने पर सुप्रीम कोर्टने चिंता जताई है*। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को एंबुलेंस सेवाओं के लिए उचित मूल्य तय करने का निर्देश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा है कि सभी राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोविड रोगियों को अस्पताल ले जाने के लिए प्रत्येक जिले में पर्याप्त संख्या में एंबुलेंस उपलब्ध कराए जाएं। देश में जैसे-जैसे संक्रमितों का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे मरीजों के लिए एंबुलेंस सेवाओं का शुल्क पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता प्रकट की है। कोर्ट ने एंबुलेंस सेवा का उचित शुल्क तय करने के निर्देश दिए हैं। स्वस्थ्य सेवाओं को सुचारू रखने वाली याचिका में सुनवाई करते हुए यह आदेश दिए गए हैं। इसके साथ कोर्ट ने सभी राज्यों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि कोरोना वायरस रोगियों को अस्पताल ले जाने के लिए हर जिले में पर्याप्त संख्या में एंबुलेंस उपलब्ध हों। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद एंबुलेंस द्वारा अपनी मनमर्जी से वसूल किए जा रहे शुल्क पर पाबंदी लग जाएगी। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, हाल ही में महाराष्ट्र के पुणे में एक एसा ही मामला सामने आया था, जिसमें जिला प्रशासन ने एक एंबुलेंस सेवा प्रदाता के खिलाफ केस दर्ज किया था। उन पर आरोप था कि 25 जून को एक कोविड-19 मरीज से सात किलो मीटर की दूरी के लिए एंबुलेंस ने 8 हजार रुपए वसूले किए थे। वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से याचिका की सुनवाई करते हुये पीठ ने कहा, ‘‘सभी राज्यों के लिये इस प्रक्रिया का पालन करना और एम्बुलेंस सेवा की क्षमता में वृद्धि करने के लिये आवश्यक कदम उठाना जरूरी है।’’ उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि कोविड-19 संदिग्ध या पुष्टि वाले मामलों को एक जगह से दूसरे स्थान पहुंचाने सहित इसके विभिन्न पहलुओं के बारे में केन्द्र द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना राज्यों के लिये जरूरी है। शीर्ष अदालत ने गैर सरकारी संगठन ‘अर्थ’ की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी करते हुये स्पष्ट किया कि ऐसे मरीजों को एम्बुलेंस में लाने ले जाने का शुल्क राज्यों को निर्धारित करना चाहिए। इस याचिका में आरोप लगाया गया था कि कोरोना वायरस से संक्रमित अथवा इससे संक्रमित होने के संदेह वाले मरीजों को ले जाने के लिये एम्बुलेंस मनमाना पैसा वसूल रही हैं। न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने केन्द्र की ओर से पेश सालिसीटर जनरल तुषार मेहता के इस कथन का संज्ञान लिया कि केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय पहले ही इस बारे में अपनाये जाने वाले मानक जारी कर चुका है और सभी राज्यों को इन पर अमल करना होगा। इसके अलावा, पीठ ने कहा कि जैसा कि याचिकाकर्ता द्वारा बताया गया है, *SOP के तहत एम्बुलेंस शुल्क के मूल्य निर्धारण के संबंध में दिशानिर्देश नहीं हैं*। इस प्रकार, राज्य सरकार को एक उचित शुल्क तय करना चाहिए और सभी एम्बुलेंस प्रदाता उस शुल्क पर एम्बुलेंस प्रदान करेंगे। 17 जून को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भारत संघ की ओर से नोटिस स्वीकार किया था। “अर्थ” नामक एक एनजीओ ने एडवोकेट ध्रुव टम्टा के माध्यम से ये याचिका दायर की। इसमें आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा 63 और 65 के तहत अपनी शक्तियों के आह्वान के लिए महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु और दिल्ली की राज्य सरकारों और केंद्र को निर्देश देने के लिए अदालत के हस्तक्षेप की मांग की गई है, ताकि COVID19 के साथ-साथ गैर- COVID19 मरीजों को भी परिवहन के लिए सक्षम करने के लिए अधिक एम्बुलेंस की आवश्यकता पूरी की जाए।
— किशन भावनानी

परिचय - किशन भावनानी

कर विशेषज्ञ एड., गोंदिया

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