लघुकथा

अभी ही देख लो!

”प्रातःभ्रमण करके आ रहे हो?” उसने पूछा.

”जी हां, बचपन से ही आदत जो बनी हुई है! इसके बिना चैन कहां?”

”क्या देखकर आए हो!”

”वही, जो रोज दिखाई देता है. फूल-पत्ते, चिड़ियां-तितलियां. हंसते-मुस्कुराते चेहरे, मन खुश हो जाता है.”

”जो देखना है, अभी ही देख लो!” उसने फिर कहा.

”क्या मतलब?”

”अंतर आपने शायद महसूस नहीं किया? रात को जल्दी सोने वाले, सुबह जल्दी जागने वाले, भोर में घूमने निकलने वाले, आंगन और पौधों को पानी देने वाले, देवपूजा के लिए फूल तोड़ने वाले, पूजा अर्चना करने वाले, प्रतिदिन मंदिर जाने वाले, रास्ते में मिलने वालों से बात करने वाले, उनका सुख दु:ख पूछने वाले, दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करने वाले, पूजा किये बगैर अन्नग्रहण न करने वाले, तीज-त्यौहार, मेहमान-शिष्टाचार, अन्न-धान्य, सब्जी-भाजी की चिंता तीर्थयात्रा, रीति-रिवाज के इर्द गिर्द घूमने वाले लोग विलुप्त-से हो रहे हैं.” उसने कटु सत्य बयां कर दिया था.

”असल में सही बात तो यही है.”

”अभी कुछ दिन पहले आप लोगों ने ‘विश्व स्वच्छ वायु दिवस’ मनाया था. कई सौ सालों के बाद ऐसा दिन आया था, वह भी कोरोना महामारी और लॉकडाउन की कीमत पर! फिर भी तुम लोगों ने कुछ सीखा नहीं, असल में तुम लोगों को कुछ दिखाई ही नहीं दिया!”

”क्या दिखाई नहीं दिया?”

”छेद!” उसकी आवाज में चेतावनी थी.

”कौन-सा छेद?”

”तुम लोगों को न तो अपने व्यक्तित्व का छेद दिखाई देता है, न अपनी छतरी का, फिर मेरी छतरी का छेद कैसे दिखाई देगा? जल्दी ही यह छेद इतना बड़ा होने वाला है, कि फूल-पत्ते, चिड़ियां-तितलियां, हंसते-मुस्कुराते चेहरे तो छोड़ो तुम अपने अस्तित्व तक को भी नहीं देख पाओगे. इसलिए कह रहा हूं, जो देखना है, अभी ही देख लो!”

अब तो आधुनिकतम डिजिटल चश्मे से भी चेतावनी देने वाला ओज़ोन दिखाई नहीं दे रहा था.

16 सितंबर, 2020
(विश्व ओज़ोन दिवस पर विशेष)

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “अभी ही देख लो!

  1. ”कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता
    एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो.”
    दुष्यंत कुमार ने जब यह शेर कहा था, तब हालात इतने बुरे नहीं थे, अब तो अपनी नादानियों से हमने ओज़ोन की पूरी छतरी को ही छिद्रमय कर दिया है. प्लास्टिक का हद से ज्यादा उपयोग, कारों का हद से ज्यादा उपयोग, नेट का हद से ज्यादा उपयोग, वृक्षों को काटकर हद से ज्यादा उपयोग, परमाणु शक्ति का हद से ज्यादा उपयोग, क्या क्या गिनाएं, ऊपर से ध्वनि प्रदूषण, सांस्कृतिक प्रदूषण आदि छिद्रों ने ओज़ोन का ही नहीं, हम सबका जीना दूभर कर दिया है. हम जल्दी नहीं चेते तो वह दिन दूर नहीं, जब आधुनिकतम डिजिटल चश्मे से भी चेतावनी देने वाला ओज़ोन दिखाई नहीं देगा.

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