कविता

मां की ममता

जब भ्रूण बनकर आया तू गर्भ में,
रक्त बनकर धमनियों में,
बह रही थी ममता।
जब तू शिशु बनकर आया गोद में,
दुग्ध बनकर स्तनों में,
बह रही थी ममता।
जब तेरी किलकारी गूंजती थी आंगन में,
होठों पर खुशी बन कर,
नाच रही थी ममता।
जब तू युवा हुआ,
और स्वयं को स्थापित किया,
गर्व वन के चेहरे से,
फूट रही थी ममता।
जब तू स्वयं के स्वार्थ बस,
मुझको छोड़ गया,
फिर भी आशीष बनकर कर,
हृदय में–
रो रही थी ममता।
— कामिनी मिश्रा

परिचय - कामिनी मिश्रा

वरिष्ठ शिक्षिका व कवयित्री प्रा.वि.लालमणि खेड़ा, वि.क्षेत्र-बीघापुर, जनपद-उन्नाव, उत्तर प्रदेश

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