कविता

काश….!

 

गुलाबी ठंड का एहसास कराता
अक्टूबर का माह आ गया है,
मैं खुश हूं…..
सूरज के रुख में थोड़ी नरमी है
अब कम हो गयी गर्मी है,
मैं खुश हूं….
प्रकृति में खिलने वाले फूलों ने
अपनी छटा बिखेरने शुरू कर दी है,
प्रकृति का मधुमास, खिले खिले एहसास
कम हो गया बरसना ए बरसात,
मैं खुश हूं….
नए-नए पक्षियों की आहट है चौबारे पर
चहचहाट, भवरों की गुंजार, हर्षित करती है अपार,
धान की फसल खड़ी है तैयार
मैं खुश हूं…..
आने वाले हैं दशहरा और दिवाली के त्यौहार
अक्टूबर के महीने से सदा ही रहा है मुझे प्यार,

मगर मैंने देखी है शिकन चेहरे पर उसके
रात सोने का नहीं है इंतज़ाम जिसके
गर्मी तो काट ली जैसे तैसे नंगे बदन
पर सर्दी पल पल जमा रही है लहू-ए- तन,
कैसे खुश रहूं……?
ओह की नन्हीं नन्हीं बूंदों को पदचिह्नों से मिटाने का
वह बचपन का खेल आज भी भाता है मुझे,
वो नन्हे नंगे पैर ओस में ठिठुरते जब देखती हूं
तो कैसे खुश रहूं…..?
सोचती हूं…….
कुछ और रंगीन और सुहावने होते ठंड के ये दिन
काश !……
अगर हर तन में गर्म कपड़ा और हर पैर में जूते होते..।

 

 

अमृता पान्डे

मैं हल्द्वानी, नैनीताल ,उत्तराखंड की निवासी हूं। 20 वर्षों तक शिक्षण कार्य करने के उपरांत अब लेखन कार्य कर रही हूं।