कहानी

कहानी – लड़का होने का मतलब ?

उसे इस बात का पूर्वानुमान था कि उसने जिस साहस ,हिम्मत और करेज के साथ उस आतंकवाद के खिलाफ अभियान चलाकर देश की मिटटी की रक्षा के जीवन में निडर और अपनी जान की परवाह किये बगैर देश के दुश्मनों का सामना किया था, उसके परिणाम स्वरुप उसे राज्य शासन ने पुलिस वीरता सम्मान तो दिया ही था, हो सकता है आगे भी केंद्र सरकार उसे पदक से नवाजे, उसकी दिनचर्या एकदम नियमित थी, सुबह चार बजे उठकर दस किलोमीटर दौड़ लगाकर घर आकार व्यायाम कराती भीर योगा करके अपने नाश्ता,दूध तैयार कर पीती अपने को हर परितिस्थि के लिए हमेशा फिट रखती थी, फिर दस बजे आफिस के लिए अपनी बुलेट प्रूफ जिप से बिना ड्राईवर के निकलती थी.
अज ऑफिस पहुची ही थी कि डी.जी.पि.साहब के लैंडलाइन से फोन आया गया था, साहब के स्टेनो ने बताया डीजीपी साहब आपका अपने कक्ष में इंतजार कर रहे हैं,आप मुख्यालय तुरंत आइए, आनन-फानन में अपनी बुलेट प्रूफ  जीप  से पुलिस मुख्यालय पहुंची,उसको सर्कार ने बुलेट प्रूफ जीप इसीलिए दी थी, कि वह आतंकवादियों के टारगेट में अपने पिछले अभियान के कारण आगई थी उसने अपने दम पर अकेले ही दस खूंखार आतंकवादियों को ख़त्म कर दिया था, मुख्यालय में साहब के चेंबर के सामने पहुंचने पर गार्ड ने बताया साहब कार्यालय के वार्षिक निरीक्षण पर निकले हैं, उसने अपनी स्लीप अर्दली को देकर अंदर रखने के लिए कहा, अंकिता समय की एकदम पाबंद और ऑफिशियल प्रोटोकॉल को निभाने वाली ईमानदार और इंसाफ पसंद पुलिस अधिकारी थी, इसीलिए उसने बड़े साहब के बुलाए जाने पर भी अपनी नाम वाली स्लिप अंदर भिजवाई थी, औपचारिकता एवं इज्जत देने में किसी को भी अपने आगे नहीं निकलने देना चाहती थी,
चपरासी और गार्ड अंदर से काफी देर तक लौटकर नहीं आए ,वह बिना किसी संकोच के ऑफिस के बाहर रखी हुई बेंच पर बैठ गई, काफी देर तक वहां कोई नहीं आया ना  गार्ड न चपरासी, फिर थोड़ी देर में डी.जी.पी. साहब खुद अन्य अधिकारियों के काफिले के साथ दिखाई दिए, अंकिता को देखते ही मुस्कुराने लगे, बोले लो सुबह से जिस शख्सियत की सब जगह चर्चा हो रही है, वह चपरासी की लेट लतीफी का शिकार हो गई, वह शर्मा गई, पूरी टीम उसे बधाई देने के साथ साहब के कमरे की तरफ ले गइ, फिर साहब ने उसे अपनी टेबल के सामने बैठाकर बताना शुरू किया, तुमने जिस बहादुरी से आतंकवादियों के सिर कुचल डाले हैं और बेसहारा आम नागरिकों की जिंदगी बचाई उसके लिए तुम्हें महामहिम राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत किया जाएगा, उसके लिए यह बात नई थी,उसने साहब को धन्यवाद ज्ञापित किया, पर वह एकदम सामान्य थी, प्रतिक्रिया विहीन, एसा तो होना ही था, दिन रात की मेहनत, इंटरनेट की खोज और मुखबिरों के साथ लगातार संपर्क, पूरे देश के बड़े बड़े अधिकारियों से टेलीफोन पर मार्गदर्शन लेकर उसने आतंकवादियों के रैकेट को तोड़ने में सफलता पाई थी,और जान की परवाह किए बगैर दस आतंकवादियों को मौके पर ही मौत की नींद सुला दी थी, और 15 आतंकवादियों को गिरफ्तार भी किया था, कुल मिलाकर कई महीनों की बिना नींद पूरी किए अभियान की सफलता के लिए उसने अपना सर्वस्व त्याग दिया था.
घर पर सब रिश्तेदारों की भीड़ बधाई देने के लिए उमड़ पड़ी थी, सब के सब दूर के ताऊ,चाचा,चाची फूफा,फुफी  वीरता के लिए  राष्ट्रपति पुलिस पुरुष्कार मिलने की खबर मीडिया और अखबारों से पूरे देश में फैल चुकी थी| ,पिताजी,माताजी,दादा,दादी इस खबर से एकदम गदगद थे, फूले नहीं समा रहे थे, पूरा परिवार अखबार और टीवी को इंटरव्यू देने में व्यस्त हो गया था, हां क्यों नहीं, हमारी सबसे छोटी और लाडली बेटी है उसे हमने पढ़ने और खेलने कूदने की पूरी छूट दे रखी थी, बड़े नाजों  से पाला था उसे, हमने उसे विदेश जाने के लिए भी छूट दे रखी थी.
उसे अब धीरे-धीरे याद आने लगा सब कुछ अतीत के पन्नों की तरह, चार बहनों में सबसे छोटी बहन घर में रोती कलपति पड़ी रहती,  मां भी कामकाज से मजबूर  रहती, पिताजी की छोटी सी नौकरी, घर में चार  बेटियों का बोझ , दादा-दादी अत्यंत बुजुर्ग उनकी दवाइयों का खर्चा, कुल मिलाकर बहुत दयनीय स्थिति हो गई थी, उस पर यह अनजानी,अनचाही संतान अंकिता, अक्सर बीमार और परेशान रहती है, उसे तो पैदाइश के समय से ही अजन्मा मान लिया गया था, ना दवाई ना इलाज, वह भगवान भरोसे चल रही थी वह सबसे आखरी में मां के साथ बचा कुचा भोजन करती फिर रसोई के सारे बर्तन धो कर दादा दादी की सेवा में लगी रहती, सब लोगों के कामकाज में  सहायता करते करते उसे रात में कब भूखे पेट नींद आ जाती पता ही नहीं चलता.
छह साल की उम्र तक उसे स्कूल ही नहीं भेजा गया या फिर उसे स्कूल भेजना भूल गए थे सब कोई हो सकता है किसी ने जरूरी ही नहीं समझा हो उसका स्कूल में दाखिला करवाना, तीन बेटियां तो स्कूल में  थी हीं,कौन सा उन लोगों ने तीर मार लिया था, जो यह छोटी लड़की तीर मार लेगी, पर बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ और स्कूल शिक्षा विभाग के अभियान के अंतर्गत उन लोगों की नजर इस अंकिता पर पड़ी, उसे उन्हीं लोगों ने पास के स्कूल में एडमिशन करवाया वरना घरवाले तो स्कूल में पढ़ानें गरीबी के कारण पक्ष में नहीं दिख रहे थे, उसे याद है उसकी बड़ी दीदीयां उससे काफी बड़ी थीं,  वह उनके फटे और बडे यूनिफार्म स्कूल जाने के लिए पहना करती, स्कूल में सब बच्चियां बच्चे और आने जाने वाले लोग उसकी हंसी  उड़ाया करते, वह देखो जोकर चली आ रही है, कई बार बहने भी उसका उपहास उड़ाया करती, वह मन मसोसकर रह जाती थी, यह सब बातें मां को बताती,मां बेचारी कुछ ना कर पाती आंखों में दो-चार आंसू बहा कर रह जाती, वह घर में तिरस्कार का पात्र ही थी, पर ईश्वर की दया से घर में विधवा बुआ ,जो हमेशा  उसे प्यार दुलार से पूछ  लिया करती,क्योंकि स्वयं विधवा होनें  से बेसहारा एकमात्र मेरे पिता यानी उसके भाई ही सहारा थे, खुद वह मुसीबत की मारी थी भरी जवानी में विधवा हो गई थी, शुक्र था निसंतान थी,वरना उनकी संतान भी अंकिता की तरह अभागी होती,
अंकिता को पाठशाला बहुत  अच्छी लगने लगी थी, ज्ञान की बातें  सहेलियों के साथ  हंसना खिलखिलाना  भले लगने लगे थे, उसकी सहेलियां उसके बेमेल कपड़े पर अब नहीं हंसती थी बल्कि उसके साफ-सुथरे लेखन की तारीफ किया करती, यह सब उसे बहुत अच्छा लगने लगा था, वह घर के सारे कष्ट भूल कर पढ़ाई को  सही तरीके से समाप्त कर ही रात में सोया करती,अब वह कक्षा में प्रथम आने लगी गुरुजी उससे प्रसन्न रहने लगे थे, उसे पढ़ने के लिए बड़ी बहनों की पुरानी किताबें ही  फटी हुई जिसके कई पन्नें गायब हुआ करते मिलती थी, वह सहेलियों की मदद से घर में किताब लाकर और रात भर में लिखकर उसे याद कर लिया करती, इस तरह उसकी लेखनी उत्कृष्ट हो गई थी, कुछ दिनों बाद वह पूरे जिले में प्रथम आई थी, पूरा स्कूल उस पर गर्व करने लगा था प्राचार्य महोदय खुद घर आकर पूरे परिवार को बधाई देकर गए थे, घर के कामों में निपुण हो चुकी थी घर के कार्य वह पढ़ाई में लग जाती, स्कूल की अनुशंसा पर उसे छात्रवृत्ति मिलना प्रारंभ हो गई थी, छात्रवृत्ति के साथ स्कूल के यूनिफॉर्म मिलने लगी अब उसके संगी साथी उसकी प्रशंसा करने लगे थे उसके नाम का उपयोग कर लोग उदाहरण दिया करते.
पूरे प्रदेश में प्रथम आने पर उसे बड़े शहर के नामी कॉलेज में ऑनर के डिग्री कोर्स के लिए एडमिशन मिल गया था, विधवा बुआ की खुशी का ठिकाना नहीं था, रात में पढ़ते समय बुआ उसे दूध और चाय बना कर दिया करती कॉलेज में एडमिशन लेने के बाद उसने पीछे पलट कर नहीं देखा अब वह 5 फुट 8 इंच की लंबी  युवती बन चुकी थी, अब शहर में उसने छोटा सा किराए का मकान लेकर अपनी पढ़ाई शुरू कर दी थी विधवा हुआ उसके साथ रहकर उसका सहारा  बन चुकी थी, तब उन्होंने एक बार रात में चाय पिलाते बुलाते बताया बेटा तू इस घर की अभागी चौथी संतान है, तू अचानक अपनी मां की कोख में आ गई थी, दादा दादी सबने बहुत विरोध किया तीन लड़कियां क्या काफी नहीं जो तू चौथी संतान पैदा कर रहा है रे राधेश्याम, मां और पिताजी में भी  बहुत झगड़ा हुआ  करता अंत में किसी की सलाह पर तेरे पेट में रहते हुए  भ्रूण एवं  लिंग परीक्षण का फैसला कर, शहर के बड़े अस्पताल में लिंग परीक्षण किया गया, उस दिन बहुत सारे लिंग परीक्षण में किए गए थे लिंग परीक्षण में तुम अपनी मां के पेट में एक लड़का थी,तब परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं था दादा दादी और तुम्हारे पिताजी की आंखों में लड़का होने की खुशी में चमक आ गई थी, तुम्हारी मां को अब दूध और ड्राई फ्रूट दिए जाने लगे थे,उसकी खूब इज्जत तवज्जो होने लगी थी और विशेष ख्याल रखा जाने लगा, क्योंकि घर में एक लड़का पैदा होने वाला था, तुम्हारी मां को पलंग से उतरने नहीं दिया जाता,आखिर में   वह दिन भी आ गया जब तुम्हारी मां के पेट से तुम यानी कि घर की चौथी  संतान लड़की हुई थी,लिंग परीक्षण के परिणाम के खिलाफ लड़के की जगह लड़की हो गई, परिवार की मानो  किस्मत ही फुट गई, घर में सन्नाटा छा गया था माँ नो घर में संतान न हुई  हो किसी की मृत्यु हो गई हो, घर से कोई तुम्हें और तुम्हारी मां को घर लाने के लिए तैयार ही ना था, उस समय मैं कुंवारी थी और मैं ही लेकर तुम दोनों को रिक्शे से घर लेकर आई थी हॉस्पिटल वालों ने बताया कि उस दिन बहुत से लिंग परिक्षण होने से जल्दबाजी में लिंग परीक्षण की रिपोर्ट बदल गई फिर लड़के की जगह लड़की हो गई.

इस बात को लेकर अंकिता अंदर तक हिल गई थी,वह समझ गई थी वह परिवार की अनचाही संतान ही है, उसे  बुआ द्वारा बताई गई बातों ने अंदर से कठोर एवं बहुत मजबूत बना दिया था,वह जिंदगी की जंग हर कीमत पर जितना चाहती थी, वह अब दुगनी रफ़्तार से मेहनत करने लगी थी,कॉलेज में सबसे ऊपर प्रथम आने पर उसे गोल्ड मेडल दिया गया,सब के सब  खुश थे, पर वह एकदम गमगीन और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित हो गई थी बीए ऑनर्स करने के बाद उसने यू.पी.एस.सी की परीक्षा देने की तैयारी कर ली,लगातार मेहनत करने और जी जान से जुट जाने पर उसे प्रथम प्रयास पर ही पुलिस की सर्वोच्च नौकरी यानी आई.पी.एस, की मिल गई थी, अब अंकिता यादव आई.पी.एस बन चुकी थी, उसने मन ही मन देश सेवा और आडंबर को मिटाने के लिए मन ही मन शपथ ले ली थी, उसने जानबूझकर उत्तर प्रदेश अपना मूल प्रदेश न चुनकर देश सेवा के लिए जम्मू काश्मीर केडर चुन लिया था, जम्मू का श्मीर से लगे बॉर्डर के जिलों में उसकी ट्रेनिंग शुरू हो गई थी वह बड़ी मेहनत से अपनी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद राजधानी के जिले में बतौर पुलिस कप्तान पदस्त की गई थी, उसने आते ही  ईमानदारी से अपनी सेवा देते हुए कई अपराधियों को पकड़ पकड़ कर सजा दिलाना शुरू किया, फिर उसे खबर लगी की स्वतंत्रता दिवस के दिन विदेशी ताकतों द्वारा भेजे गए कई आतंकवादी राजधानी में बम विस्फोट करने में लगे हुए हैं एवं कई राजनेताओं की हत्याओं  के लिए भी साजिश की जा रही है|
मुखबिर की सूचना मिलते ही कि 25 आतंकवादी देश की सरहद में घुसकर बम विस्फोट करने वाले उसने अपने चुनिंदा पुलिस के साथियों  के साथ उस कैंप में हमला कर दिया पर उसे वहां पहुंचने पर पता लगा की आतंकवादियों की संख्या अनुमान से कहीं ज्यादा थे , उसने बड़े अधिकारीयों से बैकअप फ़ोर्स भी मंगवाई पर बैकअप फोर्स  के आने में समय लगने वाला था, आतंकवादियों फायरिंग शुरू कर दी थी, उसके साथी एक-एक करके  शहीद होने  लगे, तब उसने एक हद गोला उस  कैम्प पर फेंका जिसे कई मिलिटेंट मरे गए, जिससे तिल मिलाकर मरने के बाद बचे हुए आतंकवादी बाहर निकलनें लगे, सब के सब आतंकवादी आधुनिक हथियारों से लैस थे, ऐसे में अंकिता ने अपने सहयोगी सब इंस्पेक्टर शमशेर सिंह को उसे बैक अप कवरेज देने के लिए कहा और खुद मशीन गन लेकर उन सब पर टूट पड़ी तभी उसके बाएं कंधे पर एक गोली आकर लगी, शमशेर सिंह घबरा गया पर उसने  उसका उत्साह बढ़ाते हुए आगे बढ़ने के लिए कहा और वह लगातार आगे बढ़ रही थी

लगभग 8 आतंकवादियों के मारने के बाद बहादुरी का परिचय देते हुए घायल होने के बाद भी बहादुरी से लड़ते हुए आतंकवादियों का सफाया किया था, बैकअप  कोर्स आने के बाद  बाकी बचे हुए आतंकवादियों को गिरफ्तार कर लिया गया इसके बाद अंकिता को कोई होश नहीं नहीं रह गया था,उसे तुरंत हॉस्पिटल शिफ्ट किया गया था, शमशेर सिंह की एक टांग में गोली लगने के कारण वहीं गि पड़ा था,उसे भी अंकिता के साथ हॉस्पिटल भेजा गया पर अंकिता ने स्वतंत्रता दिवस पर होने वाले अटैक को बड़ी बहादुरी और वीरता से रोका और अपनी मशीन गन से लगभग 10 आतंकवादियों को मौत के घाट उतार दिया था, इस घटना से पुलिस का मनोबल बहुत ऊंचा हो गया था प्रदेश के मुख्यमंत्री ने अस्पताल में जा कर अंकिता को शाबाशी देकर राज्य के पुलिस पदक से नवाजा था, बहादुर इंस्पेक्टर शमशेर सिंह भी कई पुरस्कारों से नवाजे गए थे,
आज राष्ट्रपति भवन में पुरस्कार लेते हुए अंकिता का उसका सीना गर्व से फूला नहीं समा रहा था राष्ट्रपति भवन में उसके साथ उसके प्रदेश के डी.जी.पी. आई.जी, डी.आई.जी. सब ने मिलकर बहुत-बहुत बधाई दी पत्रकारों ने जब पूछा कि आप इसका इसका श्रेय आप किसको देना  चाहेंगी तब उसने कहा मेरे पूरे परिवार, मेरे अधिकारी, और देश की जनता ने मुझे की हिम्मत  दी कि मैं आतंकवादियों से लड़कर अपने देश की इज्जत और संप्रभुता की रक्षा कर पाई, सबसे बड़ा श्रेय उस हॉस्पिटल को देना चाहूंगी जिसने मुझे जिंदगी में आने का मौका दिया,वहां उस समय लिंग परीक्षण में मुझे लड़का घोषित कर,मुझे पैदा होनें का मौका दिया, और इस तरह मैं बड़ी होकर देश की सेवा और रक्षा कर पाई,क्योंकि मै एक लड़का थी ?

— संजीव ठाकुर

परिचय - संजीव ठाकुर

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