मुक्तक/दोहा

दिलखुश जुगलबंदी- 33

मोल जानता है

सबके चेहरे में वह बात नहीं होती,
थोड़े-से अंधेरे से रात नहीं होती,
ज़िंदगी में कुछ लोग बहुत प्यारे होते हैं,
क्या करें उन्हीं से आजकल मुलाकात नहीं होती.

यों तो मुलाकात करने के लिए किसी बहाने की जरूरत नहीं होती,
फिर भी मुलाकात करने के बहाने बहुत हैं,
बस जरा-सा अपने प्यारों से मिलने की कशिश जगाइए,
इसी कशिश ने ही बनाए अफसाने बहुत हैं.

यूं तो हर दिल में एक कशिश होती है,
हर कशिश में एक ख्वाहिश होती है,
मुमकिन नहीं है हर एक के लिये ताजमहल बनाना,
लेकिन हर दिल में एक मुमताज होती है.

कशिश दिल की हर चीज भुला देती है,
बंद आँखों में भी सपने सजा देती है,
सपनों की दुनिया जरूर रखना दोस्त,
क्योंकि हकीकत अक्सर लोगों को रुला देती है.

यह रुलाना भी एक जश्न बन गया,
ज़ख्म जो था ही नहीं वो फिर से भर गया,
अजब है दुनिया कशिश की दोस्तो,
आज उम्मीद का जादू काम कर गया.

उम्मीद पर वो सारा जीवन काट लेता है,
आंसू के कतरों से मुस्कराना छांट लेता है,
अमीर की भूख है की कभी कम नहीं होती,
गरीब आधा निवाला भी बांट लेता है.

अमीर की भूख है की कभी कम नहीं होती,
गरीब आधा निवाला भी बांट लेता है.
खुशकिस्मत है वह तृप्त-संतुष्ट इंसान,
जो आंसू के कतरों से मुस्कराना छांट लेता है.

जीवन बांसुरी की तरह है,
जिसमें बाधाओं रूपी चाहे कितने भी छेद क्यों न हों,
लेकिन जिसको बजाना आ गया, उसे जीवन जीना आ गया.

बाधाएं ही जीवन हैं, बाधाओं से क्या डरना,
बांसुरी के छेद ही बांसुरी की जान हैं, इन छेदों को क्या गिनना,
जो छेदों-बाधाओं से पर पा लेता है,
तय है उसको सफलता मिलना.

छोड़ दें – दूसरों को नीचा दिखाना!
छोड़ दें – दूसरों की सफलता से जलना!
छोड़ दें – दूसरों के धन की चाह रखना!
छोड़ दें – दूसरों की चुगली करना!
छोड़ दें – दूसरों की सफलता पर दुखी होना!

इंतजार करने वालों को केवल उतना ही मिलता है,
जितना कोशिश करने वाले छोड़ देते हैं.

काबू में रखें – प्रार्थना के वक़्त अपने दिल को!
काबू में रखें – खाना खाते समय पेट को!
काबू में रखें – किसी के घर जाएं तो आँखों को!
काबू में रखें – महफिल में जाएं तो जबान को!
काबू में रखें – पराया धन देखें तो लालच को!

पल-पल गुजरने वाले क्षण का सदुपयोग करने वाला ही,
सच्चा मनुष्य होता रहा है.

जिंदगी को आसान नहीं मजबूत बनाना पड़ता है,
सही समय कभी नहीं आता, समय को सही बनाना पड़ता है.

सच्चा मनुष्य ही हर क्षण का मोल जानता है,
पानी का मोल जानता है,
वाणी का मोल जानता है,
प्रेम का मोल जानता है,
नेम का मोल जानता है.

(यह दिलखुश जुगलबंदी ब्लॉग ‘सदाबहार काव्यालय: तीसरा संकलन- 17’ में रविंदर सूदन, सुदर्शन खन्ना और लीला तिवानी की काव्यमय चैट पर आधारित है)

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “दिलखुश जुगलबंदी- 33

  1. चॉकलेट का मोल-
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