कविता

उपकार / उपचार अतुकांतिका

रोते को हँसाना , रूठे को मनाना
मरुथल में परिश्रम कर फूल खिलाना
दीनों की सहायता करना
बुज़ुर्गो का हाथ पकड़ कर
सड़क पार कराना , जहाँ देखो ,
कम नज़र वाले की लाठी बन जाना ।
तुम यह समझते हो कि
ये सब उपकार हैं ?
सोचो , समझो और गुनो
ये सब उपकार नहीं ,
उन बेसहारों के बहुत बड़े उपचार हैं । तुम समझो अपने ये नसीब
कि सहारे बन कर तुम
अपने नसीब बना रहे हो
भविष्य निधि के लिए तुम
अपनी पूँजी बना रहे हो ।
कैसे ? सुनो !
तुमने इन सभी को ही
जितनी अंदरूनी खुशियाँ दी हैं न !
उससे चौगुनी अस्फुट दुआएँ उन्होंने
अपने अंतस से ही
तुम्हारी खुशियों के लिए दी हैं ।
तुम्हें तो नहीं मालूम न !
बस , कभी महसूस करो
यह ख़ामोश अहसास ।
कभी स्मरण करो किये गये
अपने तुच्छ – से नेक कर्मों को ,
और अनजाने ही मिल रही
उन खुशियों की नरम , कोमल छुअन।
उपकार गिने नहीं जाते ,
उपचार कभी अंतस की प्रेरणा बिना किये नहीं जाते ,
उसके बिना ऐसा करने केलिए
कभी तुम बढ़ नहीं पाते ।
वरना कई लोग तो देख कर भी
मुँह फेर कर चले जाते हैं
और वे तो स्वार्थ सिद्धि तक ही
सीमित रह जाते हैं ।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति ‘

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